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ईशा की मेज पर आए एक प्रूफ में उस दुर्घटना की खबर है जो अभी हुई ही नहीं। कुछ देर बाद उसमें लिखे चालक की मृत्यु की खबर आती है। गलत बयान और बदली तस्वीर के पीछे जाते हुए ईशा को अपने संस्थान, अपने भाई और उन लोगों से सवाल करने पड़ते हैं जिन पर वह भरोसा करती आई है। हर नया प्रमाण किसी अंतिम उत्तर से पहले एक और कठिन जिम्मेदारी लेकर आता है।
जब खबर का सुधार उसके असर को मिटा नहीं सकता, तो सच को छापने की कीमत कौन चुकाएगा?
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