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रेतगढ़ हॉल्ट पर उन्नीस साल से कोई यात्री गाड़ी नहीं रुकी। फिर भी गोपाल मीणा हर सुबह पटरी की जाँच करता है, क्योंकि पटरी देखना उसका काम है और यही काम उसके पिता रामधन ने भी किया था। तीन महीने से तनख्वाह नहीं आई है, और घर का पानी भी टैंकर के भरोसे है।
एक आँधी के बाद प्लेटफॉर्म के पश्चिमी सिरे पर पड़े स्लीपरों के नीचे गोपाल को वह चीज़ मिलती है जो उसके पिता जानते थे और कभी बता नहीं पाए। ताँबे का एक पुराना कड़ा, उस पर ऊँट और तीन लहरों का निशान, और एक आधी फटी पर्ची।
ऊँट वाला बूढ़ा हैदर ख़ान, रेल के पुराने काग़ज़ खँगालती शिवानी और पानी बेचने वाला ठेकेदार भीम राठौड़, तीनों की नज़र उसी जगह पर है। हर किसी का मक़सद अलग है, और हर किसी के पास सच का सिर्फ़ एक टुकड़ा।
रेत के नीचे सौ साल पुराना भरोसा दबा है, और ऊपर एक रखवाले का परिवार, जिसे तय करना है कि जो मिला है वह किसका है। यह उपन्यास सोने की नहीं, पहरेदारी की कहानी है।
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