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कुछ हादसे सिर्फ़ हादसे नहीं होते।
सिंधुपुर की कड़ाके की सर्दी में रेलवे फाटक नंबर नौ पर एक रात गुज़री, और अगली सुबह एक आदमी घर नहीं लौटा। कागज़ पर सब साफ़ है, पर सब-इंस्पेक्टर नंदिनी राठौर को घड़ी का एक खाली खाना चैन नहीं लेने देता।
उधर हवलदार गणपत यादव की जेब का रुमाल बार-बार बाहर आता है, जबकि उसके माथे पर पसीना नहीं है। एक पुरानी शाम और एक नया मामला एक ही फाटक पर आकर मिलते हैं।
जब सब जवाब पटरी के उस पार हों, तो सच तक कौन-सी रेल ले जाएगी?
रेलवे फाटक नंबर नौ चौकी नंबर तेरह शृंखला की चौथी पुस्तक है: एक छोटे कस्बे की चौकी, एक ज़िद्दी अफ़सर और सच की धीमी आँच वाली कहानी।
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