You can access the distribution details by navigating to My Print Books(POD) > Distribution
मुंबई की लोकल में जगह हमेशा कम पड़ती है। कभी बैठने की, कभी साँस लेने की, और कभी अपने मन की बात कहने की।
एक साझा सीट दो अनजान ज़िंदगियों के बीच रोज़ का छोटा-सा ठहराव बनती है। सफ़र वही रहता है, पर बातें बदलती जाती हैं। भीड़ के बीच मिलती इस नज़दीकी के बाहर भी एक दुनिया है, अपनी मजबूरियों और अधूरे वादों के साथ।
क्या हर रोज़ साथ बैठने वाले दो लोग ज़िंदगी के अगले पड़ाव पर भी साथ उतर पाएँगे?
Currently there are no reviews available for this book.
Be the first one to write a review for the book लोकल की आख़िरी सीट.