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इस बस्ती की याददाश्त एक पुरानी पंजी में रखी जाती है। अब उसके सामने तीन पन्ने हैं, और जो उन पर लिखा जाता है, वही आगे चलकर नियम बन जाता है। कलम रखने वाले कम हैं, और उसे उठाने से पहले पूछने वाले उससे भी कम।
सारंग, इनाया और अर्यमन ऐसे समय इस बस्ती में पहुँचते हैं, जब पश्चिम का भारी किवाड़ बंद है। आगे बढ़ने से पहले उन्हें यहीं रुकना है, जहाँ हर किसी के पास अपना हिसाब है और हर हिसाब के पीछे किसी की मजबूरी।
फिर पंजी के सामने एक सवाल रखा जाता है। क्या लिखा हुआ सच किसी की राह तय कर सकता है? या फ़ैसला उन्हीं का रहेगा, जिनके बारे में लिखा जा रहा है?
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