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बारह चीज़ें। इकतीस साल। एक बूढ़ी बस। रघुवीर प्रसाद सिंह ने सरकारी बस चलाते हुए यात्रियों की भूली हुई बारह चीज़ें सँभालकर रखीं: एक थैला, एक घंटी, एक स्लेट, एक चिट्ठी। रिटायर होकर वह अपनी पुरानी बस नीलामी से छुड़ाता है और निकल पड़ता है उन्हें लौटाने। रास्ते में उसे एक घर से भागी लड़की, एक रूठा हुआ लड़का, और अपनी ही बेटी की बरसों पुरानी चुप्पी मिलती है। बिहार से गुजरात के रण तक की इस यात्रा में सामान कम लौटता है, लोग ज़्यादा। क्या कोई चीज़ इतने साल बाद भी अपने घर पहुँच सकती है? और क्या कोई आदमी?
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