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हर कस्बे में एक मकान होता है, जिसके बारे में सब जानते हैं और कोई पूरा नहीं।
सिंधुपुर की पुरानी लाल इमली कोठी में शादी की रात है। रोशनी है, मेहमान हैं, और ऊपर के एक बंद कमरे से दुल्हन के गहने गायब हैं। कमरे के भीतर एक लाश भी है।
सब-इंस्पेक्टर नंदिनी राठौर की बंदूक से नहीं, पूछताछ और कागज़ से लड़ना है। हर कोई इस कोठी को किसी न किसी का बताता है, पर इसका असली मालिक कौन है, यह किसी को पूरा नहीं पता।
यह किताब उसी "किसी न किसी" की तलाश है। चाय बना लीजिए। रात लंबी है।
लाल इमली की रात चौकी नंबर तेरह शृंखला की तीसरी पुस्तक है: एक छोटे कस्बे की चौकी, एक ज़िद्दी अफ़सर और सच की धीमी आँच वाली कहानी।
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