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शतद्वार भाग 20 - सच्चाई का दरबार
संगम कृष्णा
इस बसी में एक क़ानून चलता है: जो आदमी जानते हुए, अपनी मर्ज़ी से, वह बात कहना चाहे जो उसे झूठी मालूम है, उसकी बात पूरी नहीं होती। वाक्य रुक जाता है; बोलने वाला सही-सलामत रुक जाता है, और रुककर सच कह सकता है या चुप रह सकता है। भूल से कही गई गलत बात पूरी हो जाती है, और चुप्पी पर कोई पट्टी नहीं चढ़ती।
सारंग, इनाया, अर्यमन और श्रुति ऐसी बसी में बीस दिन रहते हैं, जहाँ उत्तर में सुनवाई-घर है, पश्चिम में दो दराज़ों वाला प्रमाण-कक्ष, और दक्षिण में भोजन और विश्राम के घर। यहाँ एक पुराने मामले की नई जाँच उठती है: एक लेख की बिना-इजाज़त पलटी, और पहर की एक बनाई हुई खाली जगह, जिसका हिसाब कागज़ों, तारीख़ों और एक सीमित स्वीकारोक्ति से बनता है।
शतद्वार की बीसवीं किताब एक सवाल रखती है: जब कोई एक मुहर, एक ओहदा या एक चुप्पी अकेले काफी न हो, तो सच कैसे सिद्ध होता है? और जिस बात को पूरी तरह कहा ही नहीं जा सकता, उसका हिसाब कोई दरबार कैसे रखता है?
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