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बरगद के चौक वाले इस लोक में शाम ढलते ही प्लेटें गिनी जाती हैं: छह घरों से सात प्लेटें, और सात के गिर्द बैठकर रात का हिसाब। यहाँ हर रात सब एक ही सपना देखते हैं, और सुबह उसे साझा करना इस लोक की सबसे पुरानी रस्म है।
तभी गिनती में एक आठवीं प्लेट निकलती है: एक ऐसी सोई हुई की, जिसे बरसों से कोई गिनता नहीं, और जो जागने से इनकार करती है। धीरे-धीरे सबकी नींद बंधक बनने लगती है। इसी लोक में कस्बे की लेखिका श्रुति अपना डेरा लिए ठहरी है, और उसके पास जो है, वह इस लोक के पास कभी नहीं था: लिखने की रीति।
शतद्वार की बारहवीं किताब एक सवाल रखती है: जब सबका सपना एक हो जाए, तो अपनी कहानी कौन लौटाता है? और जो जागना नहीं चाहती, उसे कैसे जगाया जाता है: बिना तोड़े, बिना छोड़े?
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