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एक शब्द। एक शर्त। कई जीवन।
एक निरस्त पासपोर्ट भोपाल की अनुवादक नयना भट्ट के दरवाज़े पर पहुँचता है। उसके भीतर बना एक पुराना निशान उस पिता की ओर इशारा करता है जिनकी मृत्यु आठ साल पहले हो चुकी है।
लेकिन हर लिखावट किसी हाथ की गवाही नहीं होती। पुराने घर की चुप्पी, अलग-अलग लोगों के ठहराव और समुद्र तक जाती रसीदें नयना को ऐसी शर्त के सामने लाती हैं जिसे उसने स्वयं गलत शब्द दे दिया था।
अब प्रश्न यह नहीं कि सातवाँ नाम किसका है। प्रश्न यह है कि किसकी आवाज़ को किसी और ने सहमति बना दिया।
एक निजी जीवन, एक अधूरा परिवार और कागज़ की सीमाओं में छिपा जासूसी-संघर्ष।
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