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रेवाघाट से नवरैल की बस दो घंटे देर से निकलती है। अनुवादक रुचिका सावंत घर लौट रही है। तभी घायल श्रमिक कविता पाटील का संदेश आता है: उसके बयान में एक शब्द छूट गया है, और मना करने का अर्थ मंजूरी बन गया है।
पास की सीट पर यतीन नायक एक बंद डिब्बा लिये है। उसमें सुनने की मशीन है और एक पुराना फोन, जिसमें सही आवाज बची हो सकती है। सड़क टूटती है। रास्ता बदलता है। सफेद कार पास आती है। कुछ लोग वस्तु अपने हाथ में चाहते हैं, जबकि उसकी मालिक उसे पहले लौटाना चाहती है।
एक रात की सराय में छह सहयात्रियों की अलग चिंताएँ साथ ठहरती हैं: पुराना पत्र, अधूरा ऋण, परीक्षा, मजदूरी और थका चालक। सुबह शहर मिलेगा, लेकिन किसे क्या लौटाना है, यह प्रश्न सड़क से आगे जाएगा।
सात मोड़ों के बाद एक मनोवैज्ञानिक सड़क-रोमांच है। यहाँ सच्चाई किसी चमत्कार से नहीं खुलती। एक गलत वाक्य को उसके असर तक देखना पड़ता है, और दूसरे की आवाज के बीच रुकना सीखना पड़ता है।
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