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1997, सोनकुंड। जूट मिल की सीटी बंद है, मज़दूरों की जेबें ख़ाली हैं, और हेमांगी की कैंटीन कुछ अनजान हाथों ने तहस-नहस कर दी है। पर टूटे बरतनों के बीच पूरा कस्बा खड़ा हो जाता है, एक रोटी, एक नाम, एक वचन के सहारे।
फिर आती है मिल की नीलामी की सूचना। ऋतविक के सामने पटना की दोगुनी तनख़्वाह है, और दादी की पीली डायरी में दूसरा वचन उसका इंतज़ार कर रहा है।
क्या हिम्मत की एक डोर पूरी बस्ती को बाँध सकती है?
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