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सांवर-ताल की सफ़ेदी के नीचे एक गर्म काला गोला है। उसकी आवाज़ सुनने वाले अलग-अलग बातें सुनते हैं। पुरातत्वविद ईशा रावत अपने पिता की अधूरी कहानी के साथ यहाँ आती है। भू-भौतिकविद कबीर अय्यर उसके पुराने शोध और पुराने भरोसे की दरार लेकर। नमक-मज़दूर रेशमा पानी के रास्ते जानती है, लेकिन उसकी बात अक्सर नक्शे के बाहर रह जाती है।
पहली खुदाई, अजीब ताप और लौटते स्वर के बीच निजी खरीद का प्रस्ताव आता है। झील ऊपर उठने लगती है। फिर एक रात गोला गायब।
खोज उन्हें एक बंद खदान तक ले जाती है। भीतर का रहस्य खुलने पर जो सामने आता है, वह किसी रत्न से अधिक कठिन है। दो लोगों को अपनी गलतियों का नाम देना होगा, और एक गांव को अपने पानी तथा ज्ञान पर अपना हक़ लिखवाना।
'हिरण्यगर्भ' लोककथा, वैज्ञानिक जिज्ञासा और मनुष्य के अधूरे संबंध की कहानी है।
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