You can access the distribution details by navigating to My Print Books(POD) > Distribution
हर साल फागुन की पूर्णिमा को होलिका जलती है। गाँव ताली बजाता है, फगुआ गाता है।
बीस बरस बाद एक पत्रकार अपने गाँव लौटता है, अपने पिता का नाम ढूँढने। नीलकोठी की बोलती दीवारें, एक बंद फ़ाइल, पोखर के किनारे उन्नीस बरस से जलता एक दीया, और चिट्ठियों में दबे दो बहनों के राज़।
आग सबने देखी। पर राख के नीचे क्या दबा है, यह किसी ने नहीं देखा।
बेतिया की मिट्टी पर रचा एक रहस्य, जहाँ सबसे बड़ा खलनायक एक चुप्पी है।
Currently there are no reviews available for this book.
Be the first one to write a review for the book होलिका की राख.