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अगर आप भी कभी किसी अड्डे पर बैठे हैं, तो ये किताब आपको अपनी लगेगी।
शाहपुर, 2005। बारहवीं के बोर्ड एग्ज़ाम खत्म हो चुके हैं, और रिज़ल्ट आने में अभी पूरी गर्मी बाकी है।
मोनू के बाबूजी के पी.सी.ओ. के बाहर एक बेंच है, जिसकी निकली हुई कील तीनों दोस्तों की पैंट कभी न कभी फाड़ चुकी है। वेदांत, जो चुपके से पुरानी कॉपियों के पीछे बातें लिखता है। रज्जू, जो हर काम में सबसे पहले कूदता है। और मोनू, जो हर प्लान पर पानी फेरता है और फिर सबके पीछे-पीछे चला आता है।
उस एक गर्मी में ये तीनों मनोज टाकीज़ पहुँचते हैं, होटल प्रेमदीपक के बिल में फँसते हैं, भूतों वाली हवेली में भूत की जगह कुछ और पाते हैं, और एक सुबह घर छोड़कर बंबई के लिए निकल पड़ते हैं।
हँसी से भरी इन कहानियों में वो बातें भी हैं, जिन पर उस उम्र में ध्यान नहीं जाता। पिता की खामोशी। माँ का बिना पूछे सब समझ लेना।
समोसे, साइकिलें और सपने उस दौर की कहानी है जब एक फोन के पास पूरा दिन बीत जाता था, दोस्ती में हिसाब नहीं रखा जाता था, और रिज़ल्ट का डर दुनिया का सबसे बड़ा डर लगता था।
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