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न पूरे कच्चे। न पूरे पके।
बाईस साल का मरसटका न पढ़ाई में अव्वल है, न नाकाम। गाँव की नज़र में वह बस थोड़ा देर से चलने वाला लड़का है। एक सुबह वह बैग में सत्तू, जेब में ढाई हज़ार रुपये और माँ के हाथ की एक अतिरिक्त रोटी लेकर पटना निकल पड़ता है। उस रोटी के बारे में किसी ने कुछ नहीं कहा।
पटना में उसे नए रास्ते मिलते हैं, अकेलापन मिलता है और एक ऐसा सवाल, जिसका जवाब आसान नहीं—आख़िर वह है कौन?
उधर गाँव में कोई उसकी लिखी कविता सँभालकर बैठा है। उसे सुनाया जाएगा, मगर तभी, जब बरसात आएगी।
वसंत से अगले वसंत तक, छह ऋतुओं में फैली यह कहानी गाँव की मिट्टी, शहर के सपनों, अधूरे एहसासों और उस उम्र की बेचैनी को छूती है, जब दुनिया आगे निकलती दिखती है और इंसान ख़ुद को समझने में लगा रहता है।
क्योंकि हर किसी के जीवन में एक वक़्त आता है, जब वह ख़ुद से पूछता है—क्या मैं सचमुच देर कर रहा हूँ?
भकुआ काका की एक बात शायद इसका जवाब देती है—
“जो पका नहीं, उसे ज़बरदस्ती नहीं पकाते।”
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