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मंडी गोबिंदगढ़, दिसंबर 1996।
बाईस साल की अनीता कुमारी भारत इस्पात के गुणवत्ता आश्वासन विभाग में कनिष्ठ निरीक्षक नियुक्त हुई है। वहाँ काम शुरू किए उसे अभी चार ही दिन हुए हैं, जब वह अपने एक वरिष्ठ अधिकारी को एक संख्या लिखते हुए देखती है। वह संख्या वह नहीं है, जो मशीन ने दी थी।
वरिष्ठ अधिकारी के पास इसके कारण हैं।
कुछ ही हफ़्तों में, वह स्वयं भी ऐसी ही एक संख्या लिखती है।
उसके पास भी इसके अच्छे कारण हैं।
हर किसी के पास होते हैं।
बीस साल बाद एक ग्राहक कंपनी से एक पत्र आता है। अनीता रिकॉर्ड रूम में जाती है, यह जानने के लिए कि इन बीते वर्षों में उसकी अपनी लिखावट आखिर क्या करती रही है।
स्टील, कागज़ और उन छोटे-छोटे समझौतों की एक शांत कहानी, जो उन्हें करने वालों के चले जाने के बाद भी बरसों तक अपना असर छोड़ते रहते हैं।
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