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रस्सी किसकी है?
गांव के कुएं की रस्सी हर दिन थोड़ी और घिसती थी।
सबको दिख रहा था। सब कहते थे — "कोई तो बदल दे इसे।"
पर सब सही दिन का इंतजार करते रहे।
और फिर एक शाम, रस्सी टूट गई।
बरसों बाद, एक यूनिवर्सिटी के कंप्यूटर रूम में, तेईस साल के अर्जुन ने अपने प्रोग्राम में एक छोटा-सा सुधार किया — कोड की बस चार लाइनें, ताकि वह थोड़ा ज्यादा भरोसेमंद बन जाए।
अगली सुबह, सैकड़ों किलोमीटर दूर तक की मशीनें थम चुकी थीं।
न कुछ चोरी हुआ था। न कुछ मिटा था।
बस एक सवाल था, जिसका जवाब किसी के पास नहीं था —
फोन किसे करें?
एक शांत, पर भीतर तक बेचैन कर देने वाली कहानी — उस व्यवस्था की, जिस पर सब निर्भर हैं, पर जो किसी की नहीं है।
आपके संगठन में, रस्सी किसकी है?
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