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नारी + पुरुष = संसार
(पूरक होते हुए भी लड़ते क्यों हैं?)
यह किताब पति-पत्नी के झगड़े की नहीं, हम सबके जीवन की कहानी है। सृष्टि कहती है नारी और पुरुष पूरक हैं, फिर वे प्रतिद्वंद्वी क्यों बन जाते हैं? एक पुरुष जो बाहर की दुनिया से लड़ता है पर घर आकर चुप रहता है, और एक नारी जो घर-बाहर सब संभाल कर भी सुनती है - तुम करती ही क्या हो?
इसी अनकहे दर्द को शब्द देते हैं इस पुस्तक के 23 लेख। अहंकार, चुप्पी, अपेक्षाएँ और जिम्मेदारियों के बोझ में कैसे प्रेम दब जाता है, और उसे कैसे बचाया जाए - यही इस पुस्तक का सार है। यह किसी को सही-गलत नहीं कहती, बस रिश्तों को समझना सिखाती है। यह पुस्तक हमें सम्मान करना सिखाती है - एक-दूसरे का, रिश्तों का, और विशेषकर उस नारी का जिसने युगों-युगों तक अपमान का दंश सहा है। यह पुस्तक याद दिलाती है कि नारी अबला नहीं, सृष्टि की जननी है और यह शाश्वत सत्य है कि जिस घर में नारी को प्रेम और सम्मान मिलता है, उस घर में लक्ष्मी स्वयं निवास करती है। वह घर सदा फलता-फूलता है।
हर घर के लिए, हर दिल के लिए। संसार को सुंदर और मधुरम बनाना है, तो पहले रिश्तों की मर्यादा समझनी होगी, एक-दूसरे की महत्ता समझनी होगी। यही प्रेम है, यही जीवन है।
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