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क्या मिट्टी सिर्फ जमीन होती है, या उसमें पीढ़ियों की कहानियाँ भी दबी होती हैं?
"मिट्टी के दस्तावेज़" एक ऐसे गाँव की कहानी है, जहाँ हवेली की ऊँची दीवारों और चमरौटी की कच्ची झोपड़ियों के बीच केवल दूरी नहीं, बल्कि सदियों से चली आ रही सामाजिक असमानता की एक गहरी खाई है।
रामपुर में ठाकुर शिवचरण सिंह की सत्ता और परंपराएँ मजबूत हैं, लेकिन उनका बेटा रामेश्वर शिक्षा और नए विचारों की रोशनी लेकर लौटता है। वह सवाल उठाता है कि क्या किसी इंसान की हैसियत उसके जन्म से तय होनी चाहिए? क्या सदियों से चली आ रही व्यवस्था इसलिए सही है क्योंकि वह पुरानी है?
दूसरी ओर कैलाश, एक दलित परिवार का जिज्ञासु और संघर्षशील युवक, शिक्षा को अपने जीवन की सबसे बड़ी उम्मीद मानता है। मिट्टी पर उँगली से अक्षर लिखने से शुरू हुआ उसका सपना धीरे-धीरे पूरे समाज को बदलने की आकांक्षा में बदल जाता है।
रामेश्वर, सरस्वती, कैलाश और उनके साथ खड़े अनेक पात्रों की यह यात्रा जाति, छुआछूत, स्त्री-शिक्षा, प्रेम, सामाजिक न्याय और मानवीय सम्मान जैसे सवालों से टकराती है। यह सिर्फ एक कहानी नहीं, बल्कि उस बदलाव की दास्तान है जो एक विचार, एक सवाल और एक साहस से शुरू होता है।
अगर आप ऐसी कहानी पढ़ना चाहते हैं जो आपको भावनात्मक रूप से छुए, सोचने पर मजबूर करे और समाज को एक नई दृष्टि से देखने का अवसर दे, तो "मिट्टी के दस्तावेज़" आज ही खरीदें और इस परिवर्तनकारी यात्रा का हिस्सा बनें।
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