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कुछ रिश्ते अचानक नहीं बनते, वे धीरे-धीरे हमारी स्मृतियों, अधूरे सपनों और साझा दर्द के बीच जन्म लेते हैं।
काशी की गलियों, गंगा के घाटों और एक पुरानी किताबों की दुकान की पृष्ठभूमि में रची गई "स्मृतियों का समंदर" विक्रम और अनुराधा की ऐसी ही भावनात्मक यात्रा है। विक्रम, जिसने अपनी माँ और फिर पिता को खोने के बाद खुद को किताबों और अकेलेपन की दुनिया में समेट लिया है, प्रेम से दूर रहना सीख चुका है। दूसरी ओर अनुराधा, पति अमन की असमय मृत्यु के बाद समाज की कठोर निगाहों और अपनी टूट चुकी जिंदगी के बीच जीना सीख रही है।
एक बारिश भरी शाम दोनों की मुलाकात होती है। किताबों के बहाने शुरू हुई बातचीत धीरे-धीरे उनके भीतर छिपे दर्द, डर और अधूरी इच्छाओं तक पहुँचती है। दो घायल मन एक-दूसरे में अपना प्रतिबिंब देखने लगते हैं।
लेकिन प्रेम का रास्ता हमेशा सरल नहीं होता। सामाजिक मान्यताएँ, अतीत की स्मृतियाँ, अपराधबोध और परिस्थितियाँ उनके रिश्ते की परीक्षा लेते हैं। फिर भी गंगा की तरह बहती जिंदगी उन्हें सिखाती है कि सच्चा प्रेम भूलना नहीं, बल्कि स्मृतियों को साथ लेकर आगे बढ़ना है।
यह उपन्यास प्रेम, विरह, पुनर्जन्म, विश्वास और उस उम्मीद की कहानी है जो सबसे गहरे अँधेरे के बाद भी जीवन में उजाला खोज लेती है।
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