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भारतीय आध्यात्मिक परंपराओं में ‘साधना’ का अर्थ केवल किसी अनुष्ठान को दोहराना नहीं है। इसका व्यापक आशय है—मन, वाणी, व्यवहार और संकल्प को किसी उच्चतर नैतिक तथा आध्यात्मिक लक्ष्य के अनुरूप क्रमशः प्रशिक्षित करना। शाक्त परंपरा में देवी को परम शक्ति के रूप में देखा जाता है और उपासना का उद्देश्य साधक की चेतना को अनुशासित, एकाग्र और उत्तरदायी बनाना माना जाता है। आर्थर एवलॉन ने शाक्त परंपरा के विवेचन में शक्ति को ब्रह्मांडीय सक्रियता और साधक के अंतर्जगत के बीच संबंध स्थापित करने वाली दार्शनिक संकल्पना के रूप में समझाया है (एवलॉन, 1918)। इस दृष्टि से माँ बगलामुखी की साधना का अध्ययन भी केवल चमत्कार, भय या शत्रु-विजय की लोकप्रिय धारणाओं तक सीमित नहीं रहना चाहिए। इसका अधिक सार्थक पक्ष वाणी के संयम, प्रतिक्रियात्मक व्यवहार पर नियंत्रण, मानसिक स्थिरता और विवेकपूर्ण मौन के अभ्यास में दिखाई देता है।
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