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अन्तःसलिला : अनुभूति की सूक्ष्म धार में जीवन का विराट स्पंदन
कविता मूलतः शब्दों में अनुभूति के उस सूक्ष्मतम कंपन को मूर्त करने की कला है, जो सामान्य अभिव्यक्ति की परिधि में समाहित नहीं हो पाता। कवि के अंतर्मन में घटित कोई क्षण, कोई दृश्य, कोई स्मृति, कोई प्रश्न अथवा कोई आकस्मिक बोध जब अपनी तीव्रता के साथ चेतना को आलोड़ित करता है, तब वह शब्दों का आश्रय ग्रहण कर कविता का रूपाकार धारण करता है। लघुकविता इसी काव्यानुभूति का संक्षिप्त, सघन और सारगर्भित रूप है। उसका लघु आकार उसके भाव-विस्तार को सीमित नहीं करता; बल्कि सीमित शब्दावकाश में असीम अर्थ-संभावनाओं को प्रतिष्ठित करना ही उसकी वास्तविक काव्य-सामर्थ्य है। लघुकविता के संबंध में उपलब्ध साहित्यिक विमर्श भी उसकी संक्षिप्तता के साथ तीक्ष्ण अनुभूति, अंतर्लय और प्रभाव-सघनता को महत्त्व देता है।
‘अन्तःसलिला’—नाम ही अपने भीतर इस कृति के भावलोक का सांकेतिक उद्घाटन करता है। अन्तःसलिला वह सरिता है जो बाहर से दृष्टिगोचर न होते हुए भी धरती के अंतराल में निरंतर प्रवाहित रहती है। मनुष्य का अंतःकरण भी ऐसी ही एक अदृश्य सलिला है—जिसमें स्मृतियाँ, स्वप्न, आकांक्षाएँ, विषाद, उल्लास, प्रश्न, अनुभूतियाँ और जीवन के अनगिनत अनाम स्पर्श निरंतर प्रवहमान रहते हैं। बाह्य जीवन में हम जितने दिखाई देते हैं, उससे कहीं अधिक अपने भीतर होते हैं। वही अदृश्य आंतरिक प्रवाह जब शब्दों का स्पर्श पाता है, तब कविता जन्म लेती है।
इस संग्रह की लघुकविताएँ इसी अंतःप्रवाह की शब्द-संवेदनाएँ हैं। इनमें कथ्य का विस्तार नहीं, अनुभूति की गहनता महत्त्वपूर्ण है; शब्दों की बहुलता नहीं, उनकी अर्थवत्ता प्रधान है। प्रत्येक कविता अपने छोटे कलेवर में किसी एक भाव, विचार, दृश्य अथवा जीवन-सत्य को इस प्रकार ग्रहण करने का प्रयत्न करती है कि पाठक के सामने केवल कविता न रहे, बल्कि उसके पीछे छिपा हुआ एक विस्तृत भाव-दृश्य भी उद्घाटित हो। इस दृष्टि से लघुकविता को केवल छोटी कविता मान लेना उसके सौंदर्य और शिल्पगत वैशिष्ट्य को सीमित कर देना होगा। लघुता यहाँ आकार का बंधन नहीं, अभिव्यक्ति की अनुशासित ऊर्जा है।
कविता में शब्द जितने कम होते जाते हैं, प्रत्येक शब्द का उत्तरदायित्व उतना ही बढ़ जाता है। एक अनावश्यक शब्द भी भाव-संरचना की लय को विचलित कर सकता है और एक सटीक शब्द सम्पूर्ण कविता को नई अर्थदीप्ति प्रदान कर सकता है। अतः लघुकविता वस्तुतः शब्द-संयम और अर्थ-विस्तार का काव्यशास्त्र है। उसमें कही हुई बात से अधिक महत्त्व कभी-कभी उस अनकहे का होता है, जिसकी अनुभूति कविता पाठक के मन में छोड़ जाती है। कविता की अंतिम पंक्ति समाप्त हो जाने के पश्चात भी यदि उसका भाव पाठक के भीतर कुछ देर तक तरंगित होता रहे, तो वही उसकी सार्थकता है।
‘अन्तःसलिला’ की संवेदना इसी बिंदु पर पाठक से संवाद स्थापित करती है। यहाँ जीवन को केवल बाह्य घटनाओं के अनुक्रम के रूप में नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर घटित होने वाली सूक्ष्म प्रक्रियाओं के रूप में देखने की प्रवृत्ति है। संबंधों की ऊष्मा और दूरी, समय की गति, स्मृतियों की अनुगूँज, प्रकृति के संकेत, सामाजिक यथार्थ, मानवीय विडंबनाएँ, आत्मसंवाद और जीवन के क्षणभंगुर सत्य—ये सभी अनुभूति के अलग-अलग स्रोत बनकर काव्य-संवेदना को समृद्ध करते हैं। इसीलिए इन रचनाओं को केवल पढ़ना पर्याप्त नहीं; इनके अर्थ-स्तरों में उतरना आवश्यक है।
लघुकविता की एक बड़ी शक्ति उसकी ध्वन्यात्मकता और सांकेतिकता में निहित होती है। वह सब कुछ स्पष्ट करके पाठक को निष्क्रिय नहीं करती; संकेत करती है और पाठक की चेतना को अर्थ-सृजन में सहभागी बनाती है। जहाँ विस्तृत कविता किसी भाव के अनेक आयामों को उद्घाटित कर सकती है, वहीं लघुकविता कभी-कभी केवल एक बिंब, एक प्रतीक अथवा एक वाक्य के माध्यम से पाठक के भीतर पूरा भावलोक जाग्रत कर देती है। यही उसकी काव्यात्मक मितव्ययिता है—कम कहना और अधिक जगा देना।
समकालीन जीवन की तीव्र गति ने मनुष्य को समय के अभाव से ही नहीं, बल्कि आत्म-संवाद के अभाव से भी घेर लिया है। सूचनाओं की विपुलता के मध्य अनुभूतियों का अवकाश निरंतर संकुचित हो रहा है। ऐसे समय में लघुकविता अपने संक्षिप्त आकार के कारण केवल सुविधाजनक पाठ नहीं, बल्कि मनुष्य को उसके भीतर लौटाने वाली साहित्यिक संवेदना भी बन सकती है। उसकी कुछ पंक्तियाँ पाठक को उस क्षण ठहरा सकती हैं, जहाँ वह अपने ही जीवन, अपने संबंधों और अपने समय को नए कोण से देखने लगता है।
‘अन्तःसलिला’ इसी ठहराव का आमंत्रण है। यह संग्रह पाठक से केवल पढ़े जाने की अपेक्षा नहीं करता; वह चाहता है कि शब्दों के पीछे बह रही उस अदृश्य धारा को भी सुना जाए, जो मनुष्य के भीतर निरंतर प्रवाहित है। संभव है किसी कविता में पाठक को अपना बीता हुआ समय दिखाई दे, किसी में वर्तमान का कोई प्रश्न, किसी में संबंधों की कोई अनकही पीड़ा और किसी में भविष्य की कोई अस्पष्ट आकांक्षा। यही साहित्य की वह शक्ति है जिसमें रचनाकार की निजी अनुभूति पाठक की निजी अनुभूति में रूपांतरित हो जाती है।
‘अन्तःसलिला’ शीर्षक की सार्थकता भी यहीं है—सलिला बाहर नहीं, भीतर बहती है; शब्द उसका केवल दृश्य तट हैं। वास्तविक कविता उन शब्दों के बीच, उनके पश्चात और पाठक के अंतर्मन में प्रवाहित होती रहती है।
यह संग्रह उसी अंतःसलिला को शब्द देने का एक विनम्र प्रयास है—जहाँ लघुता में विस्तार है, मौन में संवाद है, संकेत में सम्पूर्णता है और कुछ शब्दों के भीतर जीवन का एक विराट स्पंदन।
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