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जा साँची कई

बुंदेली व्यंग्य संग्रह
सुशील शर्मा
Type: Print Book
Genre: Literature & Fiction
Language: Hindi
Price: ₹243 + shipping
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Description

‘जा साँची कई’ : बुंदेली माटी की गंध और व्यंग्य की चुटीली धार

‘जा साँची कई’ सुशील शर्मा का बुंदेली व्यंग्य-संग्रह है, जिसमें बुंदेली लोकभाषा के सहज, आत्मीय और चुटीले स्वर के माध्यम से हमारे आसपास के सामाजिक जीवन को देखा गया है। बुंदेली केवल अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं, बल्कि इस पुस्तक में माटी, लोकसंस्कृति, जनजीवन और स्थानीय संवेदना की पहचान बनकर सामने आती है। मध्यप्रदेश के साहित्यिक संदर्भों में बुंदेली को हिन्दी की प्रमुख बोलियों में स्थान दिया जाता है। ESB MP
इस संग्रह की विशेषता यह है कि यहाँ व्यंग्य किसी कृत्रिम आक्रोश या कटुता से नहीं, बल्कि लोकजीवन की सहज हँसी और अनुभवजन्य दृष्टि से जन्म लेता है। लेखक अपने आसपास घटती छोटी-छोटी घटनाओं, सामाजिक विसंगतियों, बदलते व्यवहार, दिखावे, स्वार्थ और मानवीय कमजोरियों को बुंदेली के ठेठ मुहावरों और बोलचाल के शब्दों में पकड़ते हैं। परिणामतः पाठक को लगता है कि व्यंग्य किसी दूर बैठे लेखक ने नहीं, बल्कि उसके अपने गाँव-मोहल्ले का कोई परिचित व्यक्ति सामने बैठकर सुनाया है।
‘जा साँची कई’ का शीर्षक भी इसी लोकधर्मी तेवर का प्रतिनिधि है। बुंदेली का ‘जा साँची कई’ अर्थात् यह सच ही कहा—जैसी आत्मीय और ठेठ अभिव्यक्ति पुस्तक के स्वभाव को संकेत देती है। यहाँ भाषा में बनावटी साहित्यिकता के बजाय बोलचाल की जीवंतता है। ‘इते’, ‘उते’, ‘काय रे’, ‘भौतै’, ‘मुतकों’ जैसे लोकप्रचलित शब्द केवल हास्य उत्पन्न नहीं करते, बल्कि रचनाओं को बुंदेलखंड की अपनी जमीन से जोड़ते हैं।
लेखक की दृष्टि में व्यंग्य का उद्देश्य केवल हँसाना नहीं है। हँसी के भीतर छिपी विसंगति को पहचानना और पाठक को सहज ढंग से सोचने के लिए छोड़ देना इस संग्रह की रचनात्मक शक्ति है। कहीं व्यवस्था पर हल्की चोट है, कहीं सामाजिक दिखावे पर मुस्कान, कहीं बदलते पारिवारिक संबंधों पर टिप्पणी और कहीं मनुष्य की आदतों पर आत्मीय चुटकी। व्यंग्य का यह स्वर कटाक्ष करते हुए भी लोकजीवन से अपना रिश्ता नहीं तोड़ता।
इस संग्रह का एक महत्वपूर्ण पक्ष बुंदेली भाषा का संरक्षण और साहित्यिक प्रतिष्ठापन भी है। लोकभाषाएँ केवल संवाद का साधन नहीं होतीं; उनमें किसी क्षेत्र का इतिहास, संस्कृति, हास्य-बोध, जीवन-दर्शन और सामूहिक स्मृति सुरक्षित रहती है। ‘जा साँची कई’ उसी लोक-स्मृति को साहित्य के पन्नों पर दर्ज करने का प्रयास है।
कुल मिलाकर, ‘जा साँची कई’ बुंदेली भाषा में लिखे गए व्यंग्यों का ऐसा संग्रह है, जिसमें हँसी के पीछे जीवन का अनुभव, ठिठोली के पीछे सामाजिक दृष्टि और लोकभाषा के पीछे अपनी मिट्टी से गहरा लगाव दिखाई देता है। यह पुस्तक बुंदेली के सहज माधुर्य और व्यंग्य की पैनी दृष्टि—दोनों को एक साथ प्रस्तुत करती है।
पुस्तक के लिए एक संक्षिप्त परिचय
‘जा साँची कई’ बुंदेली व्यंग्य-संग्रह है, जिसमें बुंदेली लोकभाषा की मिठास, माटी की गंध और व्यंग्य की सहज चुटीली धार एक साथ मिलती है। सुशील शर्मा ने लोकजीवन के छोटे-छोटे प्रसंगों और सामाजिक विसंगतियों को अपनी विशिष्ट दृष्टि से देखा है। इन रचनाओं में हँसी केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि जीवन को समझने का एक माध्यम बन जाती है। ठेठ बुंदेली शब्दावली, लोकमुहावरे और सहज कथ्य इस संग्रह को अपनी जमीन से जोड़ते हैं। ‘जा साँची कई’ बुंदेली जनजीवन की बोलती-बतियाती तस्वीर है—जहाँ पाठक मुस्कुराता भी है और अनायास अपने आसपास की दुनिया को नए ढंग से देखने लगता है।

About the Author

सुशील शर्मा : शिक्षा, साहित्य और लोकसंवेदना के रचनाकार
सुशील शर्मा हिंदी साहित्य के बहुआयामी रचनाकार हैं, जिनकी साहित्य-साधना का विस्तार कविता, गीत, नवगीत, दोहा, कुंडलिया, हाइकु, तांका, लघुकथा, व्यंग्य, काव्य-नाटिका, उपन्यास, नाटक, बाल-साहित्य और वैचारिक आलेख जैसी अनेक विधाओं तक है। उपलब्ध साहित्यिक अभिलेखों में उनकी रचनात्मक यात्रा का मूल उद्देश्य जनसामान्य के सरोकारों को आवाज देना और साहित्य-सृजन के माध्यम से आत्मिक संतोष प्राप्त करना बताया गया है।
गाडरवारा की साहित्यिक और सांस्कृतिक भूमि से उनका गहरा जुड़ाव रहा है। वर्ष 2019 में गाडरवारा में उनकी चार पुस्तकों—शब्द समंदर, माटी की महक, सुनो समय और छंद का आनंद—का एक साथ विमोचन हुआ था। उस अवसर पर उनके साहित्य को समाज के सरोकारों से जोड़ने वाली रचनाधर्मिता के रूप में रेखांकित किया गया और उन्हें विभिन्न साहित्यिक विधाओं में सक्रिय रचनाकार के रूप में प्रस्तुत किया गया। रचनाकार
उनकी शिक्षा में एम.टेक. तथा एम.ए. की उपाधियाँ शामिल हैं और उनका दीर्घ व्यावसायिक जीवन शिक्षा क्षेत्र से जुड़ा रहा। उपलब्ध पुराने साहित्यिक परिचयों में उन्हें शासकीय आदर्श उच्चतर माध्यमिक विद्यालय, गाडरवारा में अंग्रेजी के वरिष्ठ अध्यापक के रूप में दर्ज किया गया है। बाद के वर्षों में उन्होंने शासकीय कन्या उच्चतर माध्यमिक विद्यालय, गाडरवारा के प्राचार्य के रूप में भी सेवाएँ दीं।
सुशील शर्मा की रचनात्मकता की एक विशेष पहचान विधागत विविधता है। उनकी आरंभिक प्रकाशित कृतियों में दरकती संवेदनाएँ, गीत विप्लव, सरोकाऱों के आईने, मन के मोती, अंतर्ध्वनि, अंतर्नाद, विज्ञान अन्वेषिका, छंद का आनंद, माटी की महक, शब्द समंदर और सुनो समय जैसी पुस्तकें दर्ज हैं। उनके लेखन में साहित्य के साथ शिक्षा, विज्ञान, सामाजिक सरोकार और मानवीय संवेदनाओं के विषय भी दिखाई देते हैं।
उनकी साहित्यिक यात्रा आगे बढ़ते हुए धार्मिक-सांस्कृतिक काव्य, काव्य-नाटिका, लघुकथा, उपन्यास और लोकभाषा के व्यंग्य तक पहुँची है। वर्तमान साहित्यिक परिचय में उनकी 37 प्रकाशित पुस्तकों का उल्लेख मिलता है। सितंबर 2026 में गाडरवारा में हिंदी साहित्य में उनके योगदान के लिए उन्हें ‘साहित्य शिरोमणि’ की मानद उपाधि से सम्मानित किए जाने की सूचना भी प्रकाशित हुई है। Aditi News
उनकी रचनाधर्मिता में भारतीय संस्कृति, सनातन परंपरा, राष्ट्रीय चेतना, शिक्षा, सामाजिक सरोकार और मानवीय मूल्य प्रमुख आधार के रूप में दिखाई देते हैं। पारिजात के फूल के प्रकाशित परिचय में भी उनकी लेखनी को परंपरा और आधुनिकता के बीच संवाद स्थापित करने वाली तथा सरल, प्रवाहपूर्ण और साहित्यिक भाषा वाली रचनाशैली के रूप में प्रस्तुत किया गया है। Pothi.com
विशेष रूप से उनकी नवीन रचनात्मक यात्रा में ‘जा साँची कई’ जैसी बुंदेली व्यंग्य-कृति उल्लेखनीय है। इसमें उन्होंने बुंदेली लोकभाषा के माध्यम से सामाजिक विसंगतियों, लोकजीवन और बदलते समय को अभिव्यक्ति दी है। इस प्रकार उनकी साहित्य-साधना में एक ओर संस्कृतनिष्ठ एवं छंदबद्ध काव्य की परंपरा दिखाई देती है, तो दूसरी ओर लोकभाषा की सहजता और समकालीन जीवन की व्यंग्यात्मक दृष्टि भी।
संक्षिप्त परिचय
सुशील शर्मा हिंदी के बहुविध रचनाकार एवं सेवानिवृत्त प्राचार्य हैं। 37 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। कविता, गीत, दोहा, हाइकु, लघुकथा, व्यंग्य, काव्य-नाटिका, उपन्यास, नाटक, बाल-साहित्य और आलेख जैसी विविध विधाओं में उनका निरंतर सृजन रहा है। शिक्षा के क्षेत्र में दीर्घ सेवाकाल के साथ उन्होंने साहित्य को जनसरोकारों, भारतीय संस्कृति, मानवीय मूल्यों और लोकजीवन से जोड़ा है। गाडरवारा उनकी कर्मभूमि और साहित्यिक पहचान का महत्वपूर्ण केंद्र रहा है। उनकी रचनाधर्मिता में परंपरा और आधुनिकता, शास्त्रीयता और लोकभाषा तथा संवेदना और सामाजिक चेतना का समन्वय दिखाई देता है।

Book Details

ISBN: 9789334473261
Publisher: Sushil Sharma
Number of Pages: 181
Dimensions: 5.5"x8.5"
Interior Pages: B&W
Binding: Paperback (Perfect Binding)
Availability: In Stock (Print on Demand)

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