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‘जा साँची कई’ : बुंदेली माटी की गंध और व्यंग्य की चुटीली धार
‘जा साँची कई’ सुशील शर्मा का बुंदेली व्यंग्य-संग्रह है, जिसमें बुंदेली लोकभाषा के सहज, आत्मीय और चुटीले स्वर के माध्यम से हमारे आसपास के सामाजिक जीवन को देखा गया है। बुंदेली केवल अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं, बल्कि इस पुस्तक में माटी, लोकसंस्कृति, जनजीवन और स्थानीय संवेदना की पहचान बनकर सामने आती है। मध्यप्रदेश के साहित्यिक संदर्भों में बुंदेली को हिन्दी की प्रमुख बोलियों में स्थान दिया जाता है। ESB MP
इस संग्रह की विशेषता यह है कि यहाँ व्यंग्य किसी कृत्रिम आक्रोश या कटुता से नहीं, बल्कि लोकजीवन की सहज हँसी और अनुभवजन्य दृष्टि से जन्म लेता है। लेखक अपने आसपास घटती छोटी-छोटी घटनाओं, सामाजिक विसंगतियों, बदलते व्यवहार, दिखावे, स्वार्थ और मानवीय कमजोरियों को बुंदेली के ठेठ मुहावरों और बोलचाल के शब्दों में पकड़ते हैं। परिणामतः पाठक को लगता है कि व्यंग्य किसी दूर बैठे लेखक ने नहीं, बल्कि उसके अपने गाँव-मोहल्ले का कोई परिचित व्यक्ति सामने बैठकर सुनाया है।
‘जा साँची कई’ का शीर्षक भी इसी लोकधर्मी तेवर का प्रतिनिधि है। बुंदेली का ‘जा साँची कई’ अर्थात् यह सच ही कहा—जैसी आत्मीय और ठेठ अभिव्यक्ति पुस्तक के स्वभाव को संकेत देती है। यहाँ भाषा में बनावटी साहित्यिकता के बजाय बोलचाल की जीवंतता है। ‘इते’, ‘उते’, ‘काय रे’, ‘भौतै’, ‘मुतकों’ जैसे लोकप्रचलित शब्द केवल हास्य उत्पन्न नहीं करते, बल्कि रचनाओं को बुंदेलखंड की अपनी जमीन से जोड़ते हैं।
लेखक की दृष्टि में व्यंग्य का उद्देश्य केवल हँसाना नहीं है। हँसी के भीतर छिपी विसंगति को पहचानना और पाठक को सहज ढंग से सोचने के लिए छोड़ देना इस संग्रह की रचनात्मक शक्ति है। कहीं व्यवस्था पर हल्की चोट है, कहीं सामाजिक दिखावे पर मुस्कान, कहीं बदलते पारिवारिक संबंधों पर टिप्पणी और कहीं मनुष्य की आदतों पर आत्मीय चुटकी। व्यंग्य का यह स्वर कटाक्ष करते हुए भी लोकजीवन से अपना रिश्ता नहीं तोड़ता।
इस संग्रह का एक महत्वपूर्ण पक्ष बुंदेली भाषा का संरक्षण और साहित्यिक प्रतिष्ठापन भी है। लोकभाषाएँ केवल संवाद का साधन नहीं होतीं; उनमें किसी क्षेत्र का इतिहास, संस्कृति, हास्य-बोध, जीवन-दर्शन और सामूहिक स्मृति सुरक्षित रहती है। ‘जा साँची कई’ उसी लोक-स्मृति को साहित्य के पन्नों पर दर्ज करने का प्रयास है।
कुल मिलाकर, ‘जा साँची कई’ बुंदेली भाषा में लिखे गए व्यंग्यों का ऐसा संग्रह है, जिसमें हँसी के पीछे जीवन का अनुभव, ठिठोली के पीछे सामाजिक दृष्टि और लोकभाषा के पीछे अपनी मिट्टी से गहरा लगाव दिखाई देता है। यह पुस्तक बुंदेली के सहज माधुर्य और व्यंग्य की पैनी दृष्टि—दोनों को एक साथ प्रस्तुत करती है।
पुस्तक के लिए एक संक्षिप्त परिचय
‘जा साँची कई’ बुंदेली व्यंग्य-संग्रह है, जिसमें बुंदेली लोकभाषा की मिठास, माटी की गंध और व्यंग्य की सहज चुटीली धार एक साथ मिलती है। सुशील शर्मा ने लोकजीवन के छोटे-छोटे प्रसंगों और सामाजिक विसंगतियों को अपनी विशिष्ट दृष्टि से देखा है। इन रचनाओं में हँसी केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि जीवन को समझने का एक माध्यम बन जाती है। ठेठ बुंदेली शब्दावली, लोकमुहावरे और सहज कथ्य इस संग्रह को अपनी जमीन से जोड़ते हैं। ‘जा साँची कई’ बुंदेली जनजीवन की बोलती-बतियाती तस्वीर है—जहाँ पाठक मुस्कुराता भी है और अनायास अपने आसपास की दुनिया को नए ढंग से देखने लगता है।
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