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पारिजात के फूल

उत्सवधर्मी कविताएँ
सुशील शर्मा
Type: Print Book
Genre: Literature & Fiction
Language: Hindi
Price: ₹249 + shipping
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Description

साहित्य जीवन की उन अनुभूतियों को शब्द देता है, जिन्हें मनुष्य अपने भीतर तो अनुभव करता है, किंतु अनेक बार उन्हें अभिव्यक्त नहीं कर पाता। "पारिजात के फूल" इसी अनुभूति लोक से उपजी कृति है। पारिजात का फूल अपने आप में एक सुंदर प्रतीक है। वह रात के अंधकार में खिलता है, भोर होते ही धरती पर झर जाता है, किंतु झरकर भी अपनी सुगंध नहीं खोता। उसके जीवन का यह छोटा सा प्रसंग मनुष्य के जीवन का भी एक गहरा रूपक बन जाता है।

मनुष्य का जीवन भी अनेक रंगों और गंधों से निर्मित है। कहीं उल्लास है, कहीं विषाद; कहीं मिलन की उजास है, तो कहीं विरह की नमी; कहीं स्मृतियों की धूप है, तो कहीं समय की छाया। जीवन की इन्हीं विविध अनुभूतियों को संवेदना के धरातल पर अनुभव करना और उन्हें शब्दों में ढालना साहित्यकार की रचनाधर्मिता है। "पारिजात के फूल" इसी रचनाधर्मिता की एक विनम्र अभिव्यक्ति है।

इस कृति का शीर्षक अपने भीतर कोमलता के साथ जीवन-दर्शन भी समेटे हुए है। पारिजात का फूल हमें सिखाता है कि जीवन की सार्थकता केवल लंबे समय तक बने रहने में नहीं, बल्कि अल्प समय में भी अपनी सुगंध बिखेर देने में है। फूल वृक्ष से अलग होकर भी अपनी पहचान नहीं खोता। वह मिट्टी पर गिरकर भी सौंदर्य और सुगंध का संदेश देता है। मनुष्य का जीवन भी तभी सार्थक होता है, जब वह अपने अस्तित्व से आगे बढ़कर दूसरों के जीवन में संवेदना, प्रेम और प्रकाश छोड़ जाए।

इस पुस्तक में जीवन के विविध अनुभवों, संबंधों, स्मृतियों और मानवीय संवेदनाओं को सहज एवं आत्मीय दृष्टि से देखने का प्रयास किया गया है। यहाँ जीवन किसी एक रंग में दिखाई नहीं देता। उसके अनेक रंग हैं और प्रत्येक रंग के पीछे कोई अनुभव, कोई स्मृति, कोई प्रश्न अथवा कोई अनकहा भाव छिपा है। यही विविधता इस कृति को उसके शीर्षक के अनुरूप अर्थ प्रदान करती है।

समय निरंतर आगे बढ़ता रहता है, लेकिन मनुष्य की स्मृतियाँ समय की गति से कहीं अधिक दीर्घजीवी होती हैं। बचपन की कोई धुंधली छवि, किसी प्रियजन का स्नेह, किसी बिछोह की पीड़ा, किसी रिश्ते की गरमाहट अथवा किसी साधारण सी घटना का असाधारण प्रभाव वर्षों बाद भी मन के किसी कोने में सुरक्षित रहता है। साहित्य उन स्मृतियों को केवल सुरक्षित नहीं रखता, उन्हें एक व्यापक मानवीय अनुभव में परिवर्तित कर देता है।

"पारिजात के फूल" इसी विश्वास की कृति है कि छोटी छोटी अनुभूतियाँ भी बड़े जीवन सत्य कह सकती हैं। किसी फूल की सुगंध की तरह कोई क्षण भी हमारे भीतर लंबे समय तक जीवित रह सकता है। किसी व्यक्ति का स्नेह, किसी संबंध की आत्मीयता अथवा किसी घटना की स्मृति हमारे व्यक्तित्व को भीतर से बदल सकती है।

इस कृति में जीवन के प्रति आस्था भी है और उसके कटु यथार्थ का स्वीकार भी। यहाँ संवेदना पलायन नहीं है, बल्कि जीवन को अधिक गहराई से समझने का माध्यम है। लेखक ने मनुष्य को उसकी कमजोरियों और खूबियों सहित देखने का प्रयास किया है, क्योंकि पूर्ण मनुष्य कहीं नहीं होता; मनुष्य अपनी अपूर्णताओं के साथ ही सुंदर और सार्थक बनता है।

पारिजात की सबसे बड़ी विशेषता शायद यही है कि वह झरकर भी समाप्त नहीं होता, बल्कि अपनी सुगंध के रूप में उपस्थित रहता है। मनुष्य भी अपने कर्म, प्रेम, विचार और संवेदनाओं के माध्यम से अपने जीवन के बाद भी दूसरों की स्मृतियों में जीवित रहता है। इस दृष्टि से यह पुस्तक केवल जीवन के अनुभवों का संकलन नहीं, बल्कि जीवन की सुगंध को बचाए रखने का एक साहित्यिक प्रयास है।

मेरा विश्वास है कि "पारिजात के फूल" के पृष्ठों से गुजरते हुए पाठक को कहीं अपना अतीत दिखाई देगा, कहीं अपने संबंधों की छवि मिलेगी और कहीं अपने ही अंतर्मन की कोई अनकही आवाज सुनाई देगी। यदि यह कृति पाठक के भीतर किसी भूली हुई स्मृति को स्पर्श कर सके, किसी संवेदना को जगा सके अथवा जीवन को थोड़ा अधिक आत्मीय दृष्टि से देखने की प्रेरणा दे सके, तो इसकी रचनात्मक यात्रा सार्थक मानी जाएगी।

यह कृति उन सभी अनुभवों, संबंधों और स्मृतियों को समर्पित है, जो जीवन में पारिजात के फूलों की तरह आए, अपनी सुगंध बिखेरी और समय की धारा में कहीं दूर चले गए, किंतु उनकी महक आज भी मन के आँगन में बनी हुई है

About the Author

लेखक परिचय

सुशील शर्मा हिंदी साहित्य के बहुविध प्रतिभा-संपन्न रचनाकार हैं। कविता, गीत, नवगीत, दोहा, कुंडलिया, लघुकथा, व्यंग्य, नाटक, एकांकी, समीक्षा तथा वैचारिक आलेख जैसी अनेक विधाओं में उनका सृजन निरंतर सक्रिय है। भारतीय संस्कृति, सनातन परंपरा, राष्ट्रीय चेतना, शिक्षा, सामाजिक सरोकार और मानवीय मूल्यों को उन्होंने अपनी रचनाओं का प्रमुख आधार बनाया है।

दीर्घकाल तक शिक्षा विभाग में सेवाएँ देने के उपरांत आपने शासकीय कन्या उच्चतर माध्यमिक विद्यालय, गाडरवारा (जिला नरसिंहपुर, मध्यप्रदेश) के प्राचार्य के रूप में अपनी सेवाएँ प्रदान कीं। शिक्षा और साहित्य—दोनों क्षेत्रों में आपका योगदान समान रूप से उल्लेखनीय रहा है। शिक्षण और प्रशासनिक दायित्वों के साथ-साथ आपने साहित्य-साधना को निरंतर जारी रखा।

आपकी अभी तक 33 पुस्तकें प्रकाशित हैं इन कृतियों में मानस के राम, वैदेही की आत्म यात्रा , धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे, शिव संकल्पमस्तु, पलकों पर ठहरा आकाश, अकेलेपन से उजालों तक, टाटपट्टी के डिजिटल सपने तथा धूप छाँव के सौ रंग ,गोविन्द गीत ,आधुनिक बुद्ध ओशो ,कहो तो कह दूँ जैसी विविध विधाओं की पुस्तकें सम्मिलित हैं। आपकी रचनाओं में भारतीय जीवन-दर्शन, नैतिक चेतना, लोकसंवेदना तथा समकालीन यथार्थ का संतुलित समन्वय दिखाई देता है।

आपकी अनेक रचनाएँ प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं तथा विभिन्न साहित्यिक मंचों पर सराही गई हैं। आपकी लेखनी परंपरा और आधुनिकता के बीच सार्थक संवाद स्थापित करने का प्रयास करती है। सरल, प्रवाहपूर्ण और साहित्यिक भाषा आपकी अभिव्यक्ति की विशेष पहचान है।

वर्तमान में आप पूर्णकालिक साहित्य-साधना में संलग्न हैं तथा हिंदी साहित्य की विविध विधाओं में सतत सृजनरत हैं। आपका उद्देश्य साहित्य के माध्यम से भारतीय सांस्कृतिक चेतना, मानवीय मूल्यों और सकारात्मक सामाजिक दृष्टि का प्रसार करना है।

डॉ. सुशील शर्मा का विश्वास है कि साहित्य केवल अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं, बल्कि समाज के नैतिक, सांस्कृतिक और मानवीय उत्थान का प्रभावी साधन भी है। यही विश्वास उनकी समस्त रचनाधर्मिता की मूल प्रेरणा है।

Book Details

ISBN: 9789359433325
Publisher: Sushil Sharma
Number of Pages: 111
Dimensions: 5.5"x8.5"
Interior Pages: B&W
Binding: Paperback (Perfect Binding)
Availability: In Stock (Print on Demand)

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