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पुस्तक में कोविड-१९ वैश्विक महामारी के विभिन्न पक्षों की गहन विवेचना की गयी है : निष्कर्ष है कि यह राजनैतिक कुटिलता एवं असीमित लोभ की व्यावसायिकता का दुष्परिणाम है । भारत के सन्दर्भ में ईस्ट इंडिया कंपनी से आरम्भ आर्थिक और बौद्धिक गुलामी का दौर आज तक जारी है : डिजिटल इंडिया , आत्मनिर्भर भारत अभियान , तथाकथित कृषि सुधारों के लिए ५ जून , २०२० को लाये अध्यादेश इसी की निरंतरता हैं । कोरोना महामारी ने भारत में व्याप्त पाखंड को उजागर किया है । आत्मानुभूति अथवा स्व की स्मृति भारत के लिए अभीष्ट है जो व्यक्ति से लेकर समाज के हर क्षेत्र में क्रन्तिकारी परिवर्तन से ही संभव है - यह पुस्तक का मुख्य सन्देश है ।
पुस्तक के अंदर से : "पाखंड में अंदरूनी शक्ति नहीं होती , सत्यनिष्ठा से दी गयी एक चुनौती भी पाखंड को क्षणमात्र में ढहा देती है । -- क्रांति परास्त नहीं होती , क्रांतिकारी क्लांत नहीं होता । असत्य से सत्य की और चलना ही क्रान्ति है ।
बच्चों पर डिजिटल दुष्प्रभाव
लेखक गत 45 वर्ष से अधिक से शिक्षा से जुड़े रहे हैं। यह पुस्तक प्रस्तावना में ही 1 महत्त्वपूर्ण विषय पर गम्भीर चिन्तन दर्शाती चेतावनी देती है जो उद्धृत है
"ऑनलाइन शिक्षा यदि पहली कक्षा से दी जाने लगेगी तो यह भारत के बच्चों के बचपन को छीनने और कुंठित करने का अक्षम्य अपराध होगा ; आज से 15-20 साल बाद ये बच्चे प्रतिशोध से या उम्र से पहले प्रौढ़ होकर परिवार, समाज और राष्ट्र के लिए अभिशाप सिद्ध होंगे इसमें कोई संदेह नहीं है। "
इसकी महत्ता 11 दिसम्बर 2025, दैनिक जागरण के सम्पादकीय को पढ़ने से स्पष्ट हो जाती है। इसका अंश इस प्रकार है," असमय जवान हो रहा बचपन समाज की प्रचलित मर्यादाओं और परम्पराओं को आहत कर रहा है। "
लेखक ने इससे भी अधिक स्मार्टफोन और ऑनलाइन शिक्षा से बच्चों के मानसिक और बौद्धिक विकास के कुंठित हो जाने की संभावना जतायी है।