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कहो तो कह दूँ

समसामयिक लघुकथाएँ
सुशील शर्मा
Type: Print Book
Genre: Literature & Fiction
Language: Hindi
Price: ₹254 + shipping
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Description

"कहो तो कह दूँ" केवल लघुकथाओं का संग्रह नहीं, बल्कि हमारे समय का सजीव दस्तावेज़ है। इस संग्रह की प्रत्येक लघुकथा समाज, शिक्षा, परिवार, प्रशासन, राजनीति, मानवीय संबंधों और बदलते जीवन-मूल्यों की किसी न किसी विसंगति को अत्यंत सहज किंतु तीक्ष्ण कथाशिल्प में उद्घाटित करती है।

इन लघुकथाओं की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इनमें लेखक पाठक को कोई उपदेश नहीं देता। पात्र स्वयं बोलते हैं, परिस्थितियाँ स्वयं प्रश्न खड़े करती हैं और अंत में एक ऐसा मारक पंच-वाक्य सामने आता है जो कथा समाप्त होने के बाद भी पाठक के भीतर देर तक गूँजता रहता है। यही कारण है कि ये लघुकथाएँ केवल पढ़ी नहीं जातीं, अनुभव की जाती हैं।
संग्रह की रचनाएँ हमारे आसपास घटित उन साधारण प्रतीत होने वाली घटनाओं को केंद्र में लाती हैं, जिनमें असाधारण सामाजिक सत्य छिपे हैं। कहीं शिक्षा व्यवस्था का खोखलापन है, कहीं मानवीय संवेदनाओं का क्षरण, कहीं पर्यावरण की उपेक्षा, कहीं संबंधों का बदलता स्वरूप, तो कहीं व्यवस्था और व्यक्ति के बीच का गहरा अंतर्विरोध। प्रत्येक कथा अपने समय से संवाद करती है और पाठक को अपने भीतर झाँकने के लिए विवश करती है।
सरल, प्रवाहपूर्ण और संप्रेषणीय भाषा, सशक्त संवाद, संक्षिप्त कथानक तथा प्रभावी अंत इस संग्रह को समकालीन हिंदी लघुकथा की परंपरा में एक सार्थक और विचारोत्तेजक कृति बनाते हैं।
"कहो तो कह दूँ" उन पाठकों के लिए है जो साहित्य में केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि समय का सच, जीवन की विडंबनाएँ और मनुष्य की अनकही पीड़ाओं की प्रामाणिक अभिव्यक्ति खोजते हैं।

About the Author

सुशील शर्मा समकालीन हिंदी साहित्य के सक्रिय और बहुआयामी रचनाकार हैं। कविता, लघुकथा, कहानी, व्यंग्य, नाटक, दोहा, हाइकु तथा आलोचनात्मक लेखन जैसी विविध विधाओं में उनकी सशक्त उपस्थिति है। उनकी रचनाओं का मूल सरोकार मनुष्य, समाज और समय से है। वे जीवन की सामान्य प्रतीत होने वाली घटनाओं में छिपे असामान्य सत्य को पहचानने और उसे सहज, प्रभावी तथा विचारोत्तेजक भाषा में अभिव्यक्त करने के लिए जाने जाते हैं।

सुशील शर्मा की साहित्य-साधना विविधता, संवेदना और सामाजिक सरोकारों से समृद्ध है। अब तक उनकी 32 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें कविता, लघुकथा, कहानी, व्यंग्य, नाटक, धार्मिक एवं पौराणिक साहित्य, आलोचना तथा वैचारिक लेखन की अनेक कृतियाँ सम्मिलित हैं।
उनकी प्रमुख कृतियों में वैदेही की आत्म यात्रा ,आधुनिक बुद्ध ओशो ,गोविन्द गीत , मानस के राम, धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे, शिवशंकल्पमस्तु, कहो तो कह दूँ, तथा अन्य अनेक साहित्यिक कृतियाँ उल्लेखनीय हैं। उनकी रचनाओं में भारतीय सांस्कृतिक चेतना, मानवीय संवेदनाएँ, समकालीन सामाजिक विसंगतियाँ, शिक्षा, नैतिक मूल्य, पर्यावरण, मानवीय संबंध तथा जीवन-दर्शन विविध रूपों में अभिव्यक्त हुए हैं।

सुशील शर्मा का साहित्य केवल भावाभिव्यक्ति नहीं, बल्कि समाज के साथ एक गंभीर और उत्तरदायी संवाद है। उनकी लघुकथाएँ अपने तीक्ष्ण कथ्य, प्रभावशाली संवाद और मारक अंत के कारण विशिष्ट पहचान रखती हैं, वहीं उनकी काव्य और धार्मिक कृतियाँ भारतीय परंपरा, आध्यात्मिकता और सांस्कृतिक मूल्यों की गहन व्याख्या प्रस्तुत करती हैं। उनकी रचनाओं का उद्देश्य केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि संवेदना, चिंतन और सामाजिक जागरूकता का विस्तार करना है।

शिक्षा जगत से लंबे समय तक जुड़े रहने के कारण उन्हें समाज, विद्यालय, प्रशासन और मानवीय संबंधों की गहरी समझ प्राप्त हुई। यही अनुभव उनकी रचनाओं को यथार्थ की ठोस भूमि प्रदान करता है। उनकी लघुकथाओं में समकालीन सामाजिक, शैक्षिक, पारिवारिक और नैतिक विसंगतियाँ बिना किसी आरोपित उपदेश के पाठक के सामने उपस्थित होती हैं। सशक्त संवाद, संक्षिप्त कथानक, तीक्ष्ण अंत और गहन मानवीय संवेदना उनकी लेखनी की प्रमुख विशेषताएँ हैं।वे साहित्य को केवल अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं, बल्कि समाज से सार्थक संवाद और मानवीय मूल्यों के पुनर्स्मरण का दायित्व मानते हैं।

"कहो तो कह दूँ" उनके इसी साहित्यिक दृष्टिकोण का सशक्त उदाहरण है, जिसमें समय के अनेक अनकहे प्रश्न लघुकथाओं के माध्यम से पाठकों के सामने रखे गए हैं। उनकी मान्यता है कि साहित्य का उद्देश्य केवल उत्तर देना नहीं, बल्कि ऐसे प्रश्न खड़े करना भी है जो पाठक को भीतर तक सोचने के लिए विवश कर दें।

Book Details

ISBN: 9789359337340
Publisher: Sushil Sharma
Number of Pages: 95
Dimensions: 5.5"x8.5"
Interior Pages: B&W
Binding: Paperback (Perfect Binding)
Availability: In Stock (Print on Demand)

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