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मानस के राम- सुशील शर्मा

"रामो विग्रहवान् धर्मः"
सुशील शर्मा
Type: Print Book
Genre: Religion & Spirituality, Crafts & Hobbies
Language: Hindi
Price: ₹460 + shipping
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Description

मानस के राम "रामो विग्रहवान् धर्मः" — यह केवल एक शास्त्रीय वाक्य नहीं, बल्कि भारतीय जीवन-दर्शन का शाश्वत सत्य है। श्रीराम केवल एक ऐतिहासिक अथवा पौराणिक पुरुष नहीं हैं; वे भारतीय संस्कृति की आत्मा, मर्यादा के सर्वोच्च प्रतिमान और लोकमंगल के आदर्श हैं। "मानस के राम" एक धार्मिक काव्य नाटिका है, जो श्रीरामचरितमानस के प्रमुख प्रसंगों पर आधारित है। इस कृति में श्रीराम के जीवन की महत्वपूर्ण घटनाओं को काव्यात्मक संवादों और नाटकीय शैली में प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है, ताकि पाठक एवं दर्शक दोनों रामकथा के आध्यात्मिक, सांस्कृतिक और मानवीय पक्षों का सहज अनुभव कर सकें। यह नाटिका रामचरितमानस की मूल भावना का सम्मान करते हुए उसके प्रमुख प्रसंगों को भावपूर्ण एवं मंचोपयोगी रूप में अभिव्यक्त करती है। आज का समाज अभूतपूर्व भौतिक प्रगति के बावजूद मानसिक अशांति, पारिवारिक विघटन, नैतिक संकट और सामाजिक असंतुलन का सामना कर रहा है। ऐसे समय में रामचरितमानस केवल एक धार्मिक ग्रंथ नहीं, बल्कि जीवन जीने की कला सिखाने वाला लोकग्रंथ बनकर सामने आता है। श्रीराम का चरित्र हमें सिखाता है कि शक्ति का आधार विनम्रता हो, अधिकार का आधार कर्तव्य हो और सफलता का आधार सत्य हो। इस काव्य नाटिका में श्रीराम के विविध रूपों—आदर्श पुत्र, आदर्श शिष्य, आदर्श भाई, आदर्श पति, आदर्श मित्र, आदर्श राजा और लोकनायक—को रामचरितमानस के प्रमुख प्रसंगों के माध्यम से सजीव बनाने का प्रयास किया गया है। भाषा सरल, भावप्रधान और मंचीय प्रस्तुति के अनुकूल रखी गई है, जिससे यह कृति पाठन के साथ-साथ नाट्य-मंचन के लिए भी उपयोगी सिद्ध हो सके। यह पुस्तक किसी मत, सम्प्रदाय या विचारधारा का प्रतिपादन नहीं करती, बल्कि श्रीराम के माध्यम से धर्म, मर्यादा, करुणा, कर्तव्य और लोकमंगल के शाश्वत संदेश को जन-जन तक पहुँचाने का एक विनम्र साहित्यिक प्रयास है। यदि इस कृति को पढ़कर या मंच पर देखकर पाठकों एवं दर्शकों के मन में श्रीराम के आदर्शों के प्रति श्रद्धा और उन्हें जीवन में अपनाने की प्रेरणा जागृत होती है, तो मैं अपने इस प्रयास को सफल मानूँगा। मैं गोस्वामी तुलसीदास जी के प्रति अपनी विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करता हूँ, जिनकी अमर कृति श्रीरामचरितमानस युगों से भारतीय जनमानस को आलोकित करती रही है। साथ ही अपने माता-पिता, गुरुजनों, परिवार, पाठकों और शुभचिंतकों के प्रति हार्दिक कृतज्ञता व्यक्त करता हूँ, जिनके स्नेह, विश्वास और प्रेरणा ने मेरी लेखनी को निरंतर बल प्रदान किया। अंत में, प्रभु श्रीराम के श्रीचरणों में यही प्रार्थना है कि यह विनम्र काव्य नाटिका समाज में सत्य, मर्यादा, प्रेम और धर्म की ज्योति को और अधिक प्रज्वलित करने का माध्यम बने।

About the Author

सुशील शर्मा समकालीन हिंदी साहित्य के संवेदनशील रचनाकार, शिक्षाविद् एवं सामाजिक चिंतक हैं। लगभग पैंतीस वर्षों तक शिक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय सेवाएँ देने के उपरांत आपने विद्यालयीन शिक्षा, भारतीय संस्कृति और मानवीय मूल्यों को अपनी लेखनी का प्रमुख विषय बनाया। आपकी रचनाओं में भारतीय जीवन-दर्शन, नैतिकता, सामाजिक चेतना और आध्यात्मिक संवेदना का सुंदर समन्वय दिखाई देता है। आपने धार्मिक काव्य नाटिकाओं के माध्यम से भारतीय संस्कृति के शाश्वत आदर्शों को सरल, सरस और मंचोपयोगी शैली में प्रस्तुत करने का सतत प्रयास किया है। आपकी अभी तक 29 किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं सीता की आत्मकथा, मानस के राम, धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे तथा शिवशंकल्पमस्तु जैसी कृतियाँ इसी साहित्यिक साधना का परिणाम हैं। आपकी लेखनी का उद्देश्य केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि समाज में संस्कार, कर्तव्यबोध और मानवीय मूल्यों का संवर्धन है। कवि, कथाकार और नाटककार के रूप में आपकी अनेक रचनाएँ विभिन्न प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं एवं साहित्यिक मंचों पर प्रकाशित और सराही गई हैं। आपकी भाषा सहज, साहित्यिक तथा भावप्रवण है, जो पाठकों के हृदय तक सीधी पहुँच बनाती है। आपका विश्वास है कि साहित्य तभी सार्थक है जब वह मनुष्य को स्वयं से, समाज से और अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने का कार्य करे। यही विश्वास आपकी प्रत्येक कृति का मूल आधार है। सुशील शर्मा गाडरवारा, जिला नरसिंहपुर (मध्य प्रदेश) मोबाइल: 9424667892 ईमेल: archanasharma891@gmail.com

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Book Details

ISBN: 9789360680060
Publisher: सुशील शर्मा
Number of Pages: 180
Dimensions: 8"x11"
Interior Pages: B&W
Binding: Paperback (Perfect Binding)
Availability: In Stock (Print on Demand)

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