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वैदेही की आत्म यात्रा

मैं अपराजिता सीता
सुशील शर्मा
Type: Print Book
Genre: Religion & Spirituality
Language: Hindi
Price: ₹287 + shipping
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Description

वैदेही की आत्म यात्रा

भारतीय साहित्य में यदि किसी नारी-चरित्र ने युगों-युगों तक मानव-हृदय को सबसे अधिक उद्वेलित किया है, तो वह वैदेही सीता हैं। वे केवल जनकनंदिनी, रामपत्नी अथवा लव-कुश की माता भर नहीं हैं, बल्कि भारतीय संस्कृति की करुणा, धैर्य, स्वाभिमान, त्याग, मर्यादा और आत्मबल की शाश्वत प्रतिमूर्ति हैं। उनका जीवन जितना बाह्य संघर्षों से भरा है, उससे कहीं अधिक वह अंतर्मन की तपश्चर्या और आत्मबोध की यात्रा है।

"वैदेही की आत्म यात्रा" उसी अंतर्मन की यात्रा का साहित्यिक अन्वेषण है। यह कृति रामकथा का पुनर्पाठ मात्र नहीं, बल्कि सीता के मौन में छिपे उन अनकहे प्रश्नों, संवेदनाओं और आत्मसंवादों को स्वर देने का विनम्र प्रयास है, जिन्हें युगों से समाज ने सुना तो है, पर पूरी तरह समझने का प्रयत्न कम ही किया है।

रामायण के विविध प्रसंगों में सीता एक ऐसी चेतना के रूप में उपस्थित होती हैं, जो प्रत्येक परिस्थिति में स्वयं को पहचानती और परखती है। मिथिला से अयोध्या, अयोध्या से वन, वन से अशोक वाटिका, पुनः अयोध्या और अंततः महर्षि वाल्मीकि के आश्रम तक की उनकी यात्रा केवल स्थान-परिवर्तन नहीं, बल्कि आत्मा के क्रमिक उत्कर्ष की यात्रा है। प्रत्येक पड़ाव उन्हें अधिक धैर्यवान, अधिक करुणामयी और अधिक आत्मप्रकाशित बनाता है।

इस पुस्तक में सीता को करुणा की निष्क्रिय प्रतिमा के रूप में नहीं, बल्कि एक सजग, विचारशील और स्वाभिमानी व्यक्तित्व के रूप में देखने का प्रयास किया गया है। यहाँ उनका मौन भी बोलता है, उनका धैर्य भी प्रश्न करता है और उनका त्याग भी जीवन के गहनतम सत्य उद्घाटित करता है। यह आत्मयात्रा बाह्य घटनाओं की अपेक्षा अंतःकरण की अनुभूतियों पर अधिक केंद्रित है।

भारतीय मनीषा में धर्म का अर्थ केवल कर्मकाण्ड नहीं, बल्कि सत्य, करुणा, न्याय और आत्मसंयम है। वैदेही इन सभी मूल्यों की जीवंत अभिव्यक्ति हैं। वे विपरीत परिस्थितियों में भी अपने आत्मविश्वास और मानवीय गरिमा को कभी नहीं छोड़तीं। यही कारण है कि उनका चरित्र प्रत्येक युग में नए अर्थों के साथ पुनर्जीवित होता रहता है।

इस कृति की प्रेरणा वाल्मीकि रामायण, श्रीरामचरितमानस, अध्यात्म रामायण, आनंद रामायण तथा भारतीय लोकपरंपरा में सुरक्षित सीता-कथा से प्राप्त हुई है। तथापि इसका भाव-विस्तार, आत्मसंवाद, मनोवैज्ञानिक विश्लेषण और साहित्यिक प्रस्तुति लेखक की मौलिक दृष्टि का परिणाम है। उद्देश्य किसी स्थापित आस्था का खंडन या समर्थन नहीं, बल्कि वैदेही के अंतर्मन तक पहुँचने का एक विनम्र साहित्यिक प्रयास है।

आज का समाज बाहरी उपलब्धियों के बीच भी भीतर से विखंडित होता जा रहा है। ऐसे समय में वैदेही की आत्मयात्रा हमें सिखाती है कि मनुष्य की वास्तविक शक्ति बाहरी वैभव में नहीं, बल्कि उसके चरित्र, धैर्य, आत्मसम्मान और सत्यनिष्ठा में निहित होती है। यह कृति पाठकों को केवल सीता के जीवन से परिचित नहीं कराएगी, बल्कि उन्हें अपने भीतर की वैदेही से भी साक्षात्कार करने की प्रेरणा देगी।

यदि इस पुस्तक का अध्ययन पाठक के अंतर्मन में आत्मचिंतन, संवेदना और जीवन-मूल्यों के प्रति नई आस्था जागृत कर सके, तो मैं अपने इस साहित्यिक प्रयास को सार्थक मानूँगा।

यह कृति आदिकवि महर्षि वाल्मीकि, गोस्वामी तुलसीदास तथा माँ जानकी के श्रीचरणों में श्रद्धापूर्वक समर्पित है। जो कुछ श्रेष्ठ है, वह उनकी कृपा है; और जो त्रुटिपूर्ण है, वह मेरी मानवीय सीमाओं का परिणाम।

जय सीताराम।

About the Author

सुशील शर्मा हिंदी साहित्य के बहुविध प्रतिभा-संपन्न रचनाकार हैं। कविता, गीत, नवगीत, दोहा, कुंडलिया, लघुकथा, व्यंग्य, नाटक, एकांकी, समीक्षा तथा वैचारिक आलेख जैसी अनेक विधाओं में उनका सृजन निरंतर सक्रिय है। भारतीय संस्कृति, सनातन परंपरा, राष्ट्रीय चेतना, शिक्षा, सामाजिक सरोकार और मानवीय मूल्यों को उन्होंने अपनी रचनाओं का प्रमुख आधार बनाया है।शिक्षा और साहित्य—दोनों क्षेत्रों में आपका योगदान समान रूप से उल्लेखनीय रहा है। शिक्षण और प्रशासनिक दायित्वों के साथ-साथ आपने साहित्य-साधना को निरंतर जारी रखा।

आपकी अभी तक उनतीस पुस्तकें प्रकाशित हैं एवं प्रकाशनाधीन कृतियों में मानस के राम, वैदेही की आत्म यात्रा , धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे, शिव संकल्पमस्तु, पलकों पर ठहरा आकाश, अकेलेपन से उजालों तक, टाटपट्टी के डिजिटल सपने तथा धूप छाँव के सौ रंग ,गोविन्द गीत ,आधुनिक बुद्ध ओशो जैसी विविध विधाओं की पुस्तकें सम्मिलित हैं। आपकी रचनाओं में भारतीय जीवन-दर्शन, नैतिक चेतना, लोकसंवेदना तथा समकालीन यथार्थ का संतुलित समन्वय दिखाई देता है।

आपकी अनेक रचनाएँ प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं तथा विभिन्न साहित्यिक मंचों पर सराही गई हैं। आपकी लेखनी परंपरा और आधुनिकता के बीच सार्थक संवाद स्थापित करने का प्रयास करती है। सरल, प्रवाहपूर्ण और साहित्यिक भाषा आपकी अभिव्यक्ति की विशेष पहचान है।वर्तमान में आप पूर्णकालिक साहित्य-साधना में संलग्न हैं तथा हिंदी साहित्य की विविध विधाओं में सतत सृजनरत हैं। आपका उद्देश्य साहित्य के माध्यम से भारतीय सांस्कृतिक चेतना, मानवीय मूल्यों और सकारात्मक सामाजिक दृष्टि का प्रसार करना है।

सुशील शर्मा का विश्वास है कि साहित्य केवल अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं, बल्कि समाज के नैतिक, सांस्कृतिक और मानवीय उत्थान का प्रभावी साधन भी है। यही विश्वास उनकी समस्त रचनाधर्मिता की मूल प्रेरणा है।

Book Details

ISBN: 9789360683801
Publisher: Sushil Sharma
Number of Pages: 85
Dimensions: 8"x11"
Interior Pages: B&W
Binding: Paperback (Perfect Binding)
Availability: In Stock (Print on Demand)

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