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गढ़वाल की देवदार और बाँज के जंगलों से घिरी सेम-मुखेम घाटी। कार्तिक की अमावस की एक रात, शहर से लौटा नौजवान विक्रम जंगल से आती एक रहस्यमयी बाँसुरी की धुन का पीछा करता है। एक प्राचीन खंडहर में नीली रोशनी के बीच उसे मिलती है तारा, एक अनजान युवती, जो उसका नाम जानती है।
बुग्याल में मिले एक पुराने त्रिशूल-पत्थर को छूने की एक भूल ने सौ साल से सोई शक्तियों को जगा दिया है। बर्फ पिघल रही है, घाटी के रक्षक कमज़ोर पड़ रहे हैं, और गाँव में कोई मुस्कुराता चेहरा अपना असली रूप छिपाए बैठा है।
अमावस पूरी होने से पहले विक्रम को अपने पुरखों के राज़ का सिरा पकड़ना होगा। यह सफ़र उसे नाग-द्वार, नरसिंह मंदिर और रूपकुंड की बर्फीली घाटी तक ले जाता है, जहाँ हर कदम पर कोई पहेली, कोई परीक्षा और कोई अदृश्य निगाह उसका इंतज़ार कर रही है।
"नंदा के साए में" लोककथाओं, आस्था और रोमांच से बुना एक रहस्य-रोमांच उपन्यास है, जो गढ़वाल हिमालय की नंदा देवी की परंपरा और देवभूमि की जीवंत संस्कृति को एक तेज़ रफ़्तार कथा के रूप में सामने लाता है।
अगर आपको पहाड़ी पृष्ठभूमि की रहस्य-कथाएँ, पौराणिक रोमांच और दिलचस्प हिंदी कहानियाँ पसंद हैं, तो यह उपन्यास आपके लिए है।
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