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“35 नम्बर की कीमत तुम क्या जानो डॉक्टर बाबू…”
इंजीनियरिंग के दिनों में यह बात मज़ाक में कही जाती थी।
क्योंकि सच यही था —
पूरा सेमेस्टर जैसे-तैसे निकल जाता,
और असली पढ़ाई शुरू होती सिर्फ एग्जाम से एक रात पहले।
यह किताब उसी दौर के पाँच ऐसे इंजीनियरों की कहानियाँ है —
जो एग्जाम की रातों में तो किसी तरह पास हो गए,
लेकिन जिंदगी की असली परीक्षाओं में अपनी-अपनी अलग लड़ाई लड़ते रहे।
किसी ने देश की सबसे कठिन परीक्षा पास की,
किसी ने दूसरों को पढ़ाकर खुद को बनाया,
किसी ने अपनी जिंदगी गलत रास्तों में खो दी,
किसी ने टूटकर फिर खुद को खड़ा किया,
और किसी ने पूरे परिवार की जिम्मेदारी उठाई।
यह सिर्फ इंजीनियरिंग की कहानी नहीं है —
यह उस पूरी पीढ़ी की कहानी है
जो 35 नंबर के लिए जूझती रही,
और जिंदगी के इम्तिहान में खुद को साबित करती रही।
अगर आप भी कभी एग्जाम से एक रात पहले पढ़े हैं —
तो यह किताब आपकी है।
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