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जिस दिन भगवान मर गया (विश्वास से विवेक तक की यात्रा)
क्या भगवान सचमुच मर सकता है ? यह प्रश्न जितना असहज है, उतना ही गहरा भी। “जिस दिन भगवान मर गया” किसी धर्म, आस्था या ईश्वर के अस्तित्व के विरुद्ध लिखी गई कहानी नहीं, बल्कि उस मानसिकता की पड़ताल है जिसमें मनुष्य अपने प्रश्नों, भय, अंधविश्वास और सामाजिक रूढ़ियों के बीच अपने विवेक को खो देता है। यह पुस्तक एक ऐसी वैचारिक यात्रा है, जिसमें विश्वास से प्रश्न तक, प्रश्न से तर्क तक और तर्क से विवेक तक पहुँचने की कोशिश की गई है। इसमें ईश्वर, धर्म, आस्था, समाज, राजनीति, मानवीय संवेदना और नैतिकता जैसे विषयों को एक मानवीय और प्रश्नाकुल दृष्टि से देखा गया है।
जब आस्था मनुष्य को सहारा देती है, तो वह शक्ति बनती है; लेकिन जब वही आस्था प्रश्न पूछने से रोक देती है, भय पैदा करती है या मनुष्य को मनुष्य से बाँटने लगती है, तब एक नया प्रश्न जन्म लेता है—क्या हमें ईश्वर को खोजने से पहले अपने भीतर के मनुष्य को नहीं खोजना चाहिए ?
यह उपन्यास पाठक को किसी निष्कर्ष को स्वीकार करने के लिए बाध्य नहीं करता। इसके बजाय वह उसे अपने भीतर झाँकने, सवाल पूछने और स्वयं निर्णय लेने के लिए प्रेरित करता है। “जिस दिन भगवान मर गया” दरअसल भगवान की मृत्यु की कहानी नहीं, बल्कि अंधविश्वास की मृत्यु और विवेक के जन्म की कहानी है। एक ऐसी यात्रा, जहाँ मंज़िल कोई अंतिम जवाब नहीं अपितु प्रश्न पूछने का साहस है।
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