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'माँ ने जो नहीं कहा…’ नवल किशोर सोनी का संवेदनशील और भावनात्मक उपन्यास है, जो माँ-बेटी के रिश्ते, अनकहे प्रेम, त्याग, संघर्ष, स्मृतियों और जीवन की आकांक्षाओं को केंद्र में रखता है। यह कहानी उस माँ की भावनाओं को समझने का प्रयास करती है, जो अपने बच्चों के लिए जीवन भर बहुत कुछ करती है, लेकिन अपनी इच्छाओं, सपनों और पीड़ा को अक्सर शब्द नहीं दे पाती।
एक बेटी की दृष्टि से माँ के जीवन को देखने वाली यह कहानी अतीत की स्मृतियों, वर्तमान की संवेदनाओं और भविष्य की उम्मीदों के बीच आगे बढ़ती है। माँ की चुप्पी, उसके निर्णयों और उसके छोटे-बड़े त्यागों के पीछे छिपे प्रेम को समझते हुए कहानी पाठक को रिश्तों की उन गहराइयों तक ले जाती है, जहाँ बहुत कुछ कहा नहीं जाता, केवल महसूस किया जाता है।
यह उपन्यास केवल माँ की कहानी नहीं, बल्कि परिवार, स्त्री-मन, रिश्तों और मानवीय संवेदनाओं की कहानी है। सरल, आत्मीय और प्रभावशाली भाषा में लिखी गई यह कृति पाठक को अपने जीवन की माँ, अपने रिश्तों और उन अनकहे भावों को नए दृष्टिकोण से देखने के लिए प्रेरित करती है।'माँ ने जो नहीं कहा…’ नवल किशोर सोनी का संवेदनशील और भावनात्मक उपन्यास है, जो माँ-बेटी के रिश्ते, अनकहे प्रेम, त्याग, संघर्ष, स्मृतियों और जीवन की आकांक्षाओं को केंद्र में रखता है। यह कहानी उस माँ की भावनाओं को समझने का प्रयास करती है, जो अपने बच्चों के लिए जीवन भर बहुत कुछ करती है, लेकिन अपनी इच्छाओं, सपनों और पीड़ा को अक्सर शब्द नहीं दे पाती।
एक बेटी की दृष्टि से माँ के जीवन को देखने वाली यह कहानी अतीत की स्मृतियों, वर्तमान की संवेदनाओं और भविष्य की उम्मीदों के बीच आगे बढ़ती है। माँ की चुप्पी, उसके निर्णयों और उसके छोटे-बड़े त्यागों के पीछे छिपे प्रेम को समझते हुए कहानी पाठक को रिश्तों की उन गहराइयों तक ले जाती है, जहाँ बहुत कुछ कहा नहीं जाता, सिर्फ़ महसूस किया जाता है।
यह उपन्यास सिर्फ़ माँ की कहानी नहीं, बल्कि परिवार, स्त्री-मन, रिश्तों और मानवीय संवेदनाओं की कहानी है। सरल, आत्मीय और प्रभावशाली भाषा में लिखी गई यह कृति पाठक को अपने जीवन की माँ, अपने रिश्तों और उन अनकहे भावों को नए दृष्टिकोण से देखने के लिए प्रेरित करती है।
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