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धर्मसंस्थापनार्थाय अनिलचंद्र ठाकुर की एक तीखी सामाजिक और राजनीतिक व्यंग्य कथा है, जिसकी पृष्ठभूमि ग्रामीण बिहार का वह संसार है जहाँ सत्ता, प्रतिष्ठा, भय, संरक्षण और जनविश्वास एक दूसरे में उलझे हुए हैं।
कहानी के केंद्र में हैं फणि बाबू, जो स्वयं को गरीबों, वंचितों और साधारण लोगों के हितैषी नेता के रूप में स्थापित करते हैं। उनके चारों ओर धीरे धीरे प्रभाव, व्यक्तिपूजा और राजनीतिक संरक्षण का ऐसा संसार बनता है जहाँ सार्वजनिक नैतिकता और निजी आचरण के बीच की दूरी लगातार गहरी होती जाती है।
व्यंग्य, विडंबना और सामाजिक अवलोकन के माध्यम से यह कहानी सत्ता के आकर्षण, राजनीतिक पाखंड, सामाजिक न्याय की भाषा, ग्रामीण समाज की असमानताओं और कमजोर लोगों की असुरक्षा को सामने लाती है।
धर्मसंस्थापनार्थाय किसी राजनीतिक निष्कर्ष को पाठक पर थोपती नहीं, बल्कि उस असहज प्रश्न को सामने रखती है जो सत्ता और नैतिकता के बीच पैदा होता है।
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