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स्पंदन - सूक्ष्म, संवेदना, कंपन, प्रज्ञा, जीवन और मृत्यु के बीच स्थित वह अदृश्य माध्यम है, जो हमें जोड़ता है। मेरे विचार से अंग्रेज़ी के शब्द “Consciousness / कॉन्शसनेस” स्पंदन है। चेतना का अनुभव भी कहीं न कहीं स्पंदन के माध्यम से ही होता है—एक ऐसी सूक्ष्म गतिविधि, जो दिखाई नहीं देती, लेकिन जिसके होने का आभास हर क्षण होता रहता है ।
हमारे भीतर उठती हर अनुभूति, हर विचार, हर भावना और हर सांस में एक स्पंदन है। हृदय की धड़कन हो, सांस का आना-जाना हो, मन में उठती कोई इच्छा हो या आत्मा की कोई कही - अनकही पुकार—इन सबके मूल में एक सूक्ष्म कंपन है – स्पंदन ।
हम जिसे आत्मा कहते हैं, जिसे प्राण कहते हैं, शायद वे सभी उसी स्पंदन के अलग-अलग आकार हैं। वे सभी उसी स्पंदन से निकले हैं, उसी में जीवित हैं और शायद अंततः उसी में विलीन हो जाते हैं।
स्पंदन न जीता है, न मरता है। वह शाश्वत है। स्पंदन है, तो चेतना है, चेतना है, तो जीवन है, और जहाँ जीवन है, वहाँ गति है, अनुभूति है, अस्तित्व है।
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