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क्या हम वाकई जानते हैं कि हम क्यों मानते हैं?
बुराड़ी की वह रात जहाँ ग्यारह जिंदगियाँ एक धार्मिक अनुष्ठान में समाप्त हो गईं, जोन्सटाउन के 900 शव, हेवन गेट के 39 अनुयायी — ये केवल संख्याएँ नहीं, चेतावनियाँ हैं। "क्यों मानते हैं हम?" इसी अनुत्तरित प्रश्न से जन्मी एक साहसिक पुस्तक है, जो विश्वास, ईश्वर और संस्थागत धर्म की मनोवैज्ञानिक, ऐतिहासिक और तार्किक जड़ों की गहरी पड़ताल करती है।
बारह अध्यायों में फैली यह पुस्तक भय के जन्म और "नियंत्रण के भ्रम" से शुरू होकर, धार्मिक मान्यताओं की तार्किक परीक्षा, संस्थागत धर्म की सामाजिक लागत, आत्मा और परलोक पर न्यूरोसाइंस के प्रमाण, उपनिषदों की गहन खोज-पद्धति, और सुकरात से लेकर भगत सिंह तक पंद्रह महान विचारकों के तर्कों से होकर गुज़रती है। लेखक डैनियल काह्नमैन के व्यवहार-अर्थशास्त्र और रिचर्ड डॉकिन्स की जैविक अंतर्दृष्टि को उपनिषदों की 'नेति-नेति' पद्धति और चार्वाक दर्शन के साथ एक अनूठे संवाद में पिरोते हैं।
यह पुस्तक किसी की आस्था को ठेस पहुँचाने या ईश्वर को नकारने के लिए नहीं, बल्कि प्रश्न पूछने का साहस जगाने के लिए लिखी गई है। सुकरात, बुद्ध और विवेकानंद की उसी परंपरा में खड़े होकर, यह हर उस जिज्ञासु पाठक के लिए है जो सुविधाजनक उत्तरों से आगे बढ़कर असुविधाजनक प्रश्नों का सामना करना चाहता है।
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