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गुलदस्ता तर्क, आस्था और भारतीय समाज का सच्चा आईना

Anoop Pachauri
Type: Print Book
Genre: Social Science, Religion & Spirituality
Language: Hindi
Price: ₹200 + shipping
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Description

क्या सच सिर्फ इसलिए सच है क्योंकि उसे मानने वालों की भीड़ बड़ी है?

"गुलदस्ता" पाँच स्वतंत्र मगर आपस में गुंथे अध्यायों का संग्रह है, जो एक ही सवाल की परतें खोलता है — हम जो मानते हैं, उसे हम आख़िर क्यों मानते हैं। बीस वर्षों के अध्यापन-अनुभव से निकली यह पुस्तक "भीड़ के प्रमाण" के तार्किक भ्रम से शुरू होकर जाति-व्यवस्था, आरक्षण, अंधविश्वास और धर्म-राजनीति के ख़तरनाक गठजोड़ की पड़ताल करती है; अध्यात्म व ध्यान से जुड़े पाँच मनोवैज्ञानिक भ्रमों को बेनक़ाब करती है; विवाह और नैतिकता के ऐतिहासिक विकास को खंगालती है; और अंत में पूछती है — मनुष्य के मस्तिष्क ने ईश्वर की कल्पना आख़िर क्यों और कैसे की।

लेखक चार्वाक और बुद्ध के कालाम सुत्त से लेकर भगत सिंह, डॉ. आंबेडकर, पेरियार और डॉ. नरेंद्र दाभोलकर तक भारत की अपनी संशयवादी परंपरा को सामने लाते हैं, और इसे डैनियल कानेमन, बर्ट्रेंड रसल, कार्ल सागान व रिचर्ड फाइनमैन जैसे आधुनिक विचारकों की कसौटी पर कसते हैं — संविधान के अनुच्छेद 51-क(ज) की भावना के अनुरूप।

यह पुस्तक किसी की आस्था पर हमला नहीं है। यह केवल इतना कहती है कि दावा जितना बड़ा हो, प्रमाण भी उतना ही ठोस माँगा जाना चाहिए। यह उन जिज्ञासु पाठकों के लिए है जो सहमत होने के लिए नहीं, सोचने के लिए पढ़ते हैं।

About the Author

अनूप पचौरी शिक्षक, लेखक और स्वतंत्र चिंतक हैं, जिनकी बौद्धिक यात्रा शिक्षा, समाज, इतिहास, विज्ञान, दर्शन और मानवीय मूल्यों के बीच निरंतर संवाद से विकसित हुई है। वर्षों के शिक्षण अनुभव ने उन्हें यह समझने का अवसर दिया कि मनुष्य कक्षा में जिस तर्क, प्रमाण और जिज्ञासा का प्रयोग करता है, वही दृष्टि जीवन, परंपरा और सामाजिक मान्यताओं के प्रश्नों पर भी लागू की जानी चाहिए।

इसी अनुभव और जिज्ञासा से ‘गुलदस्ता’ की वैचारिक भूमि तैयार हुई। पुस्तक में वे भीड़ की स्वीकृति और सत्य के संबंध, धर्म और उसके सामाजिक प्रभाव, अध्यात्म एवं ध्यान से जुड़े दावों, नैतिकता और विवाह के ऐतिहासिक विकास तथा मनुष्य द्वारा ईश्वर की कल्पना जैसे प्रश्नों की पड़ताल करते हैं। इन अलग-अलग विषयों के पीछे उनका मूल प्रश्न एक ही है—हम जो मानते हैं, उसे हम क्यों मानते हैं?

उनकी लेखनी परंपरा को केवल स्वीकार या अस्वीकार करने के बजाय उसे तर्क, प्रमाण, इतिहास और मानवीय अनुभव की कसौटी पर समझने का प्रयास करती है। वे भारतीय चिंतन की संशयवादी और तर्कशील परंपराओं को आधुनिक विज्ञान, मनोविज्ञान और सामाजिक चिंतन के साथ संवाद में रखते हैं।

‘गुलदस्ता’ इसी दृष्टि का विस्तार है—एक ऐसी पुस्तक जो किसी तैयार निष्कर्ष को थोपने के बजाय पाठक को रुकने, प्रश्न करने, परखने और अपने विवेक से सोचने के लिए आमंत्रित करती है। लेखक के लिए प्रश्न पूछना विरोध नहीं, बल्कि समझ की शुरुआत है; और बेहतर समाज की दिशा में पहला कदम भी।

Book Details

Publisher: Self-Published
Number of Pages: 109
Dimensions: 5.82"x8.28"
Interior Pages: B&W
Binding: Paperback (Perfect Binding)
Availability: In Stock (Print on Demand)

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