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क्या सच सिर्फ इसलिए सच है क्योंकि उसे मानने वालों की भीड़ बड़ी है?
"गुलदस्ता" पाँच स्वतंत्र मगर आपस में गुंथे अध्यायों का संग्रह है, जो एक ही सवाल की परतें खोलता है — हम जो मानते हैं, उसे हम आख़िर क्यों मानते हैं। बीस वर्षों के अध्यापन-अनुभव से निकली यह पुस्तक "भीड़ के प्रमाण" के तार्किक भ्रम से शुरू होकर जाति-व्यवस्था, आरक्षण, अंधविश्वास और धर्म-राजनीति के ख़तरनाक गठजोड़ की पड़ताल करती है; अध्यात्म व ध्यान से जुड़े पाँच मनोवैज्ञानिक भ्रमों को बेनक़ाब करती है; विवाह और नैतिकता के ऐतिहासिक विकास को खंगालती है; और अंत में पूछती है — मनुष्य के मस्तिष्क ने ईश्वर की कल्पना आख़िर क्यों और कैसे की।
लेखक चार्वाक और बुद्ध के कालाम सुत्त से लेकर भगत सिंह, डॉ. आंबेडकर, पेरियार और डॉ. नरेंद्र दाभोलकर तक भारत की अपनी संशयवादी परंपरा को सामने लाते हैं, और इसे डैनियल कानेमन, बर्ट्रेंड रसल, कार्ल सागान व रिचर्ड फाइनमैन जैसे आधुनिक विचारकों की कसौटी पर कसते हैं — संविधान के अनुच्छेद 51-क(ज) की भावना के अनुरूप।
यह पुस्तक किसी की आस्था पर हमला नहीं है। यह केवल इतना कहती है कि दावा जितना बड़ा हो, प्रमाण भी उतना ही ठोस माँगा जाना चाहिए। यह उन जिज्ञासु पाठकों के लिए है जो सहमत होने के लिए नहीं, सोचने के लिए पढ़ते हैं।
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