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यदि ईश्वर सर्वज्ञ है, तो वह अन्यायी क्यों दिखता है?" — बचपन में पूछा गया यह एक प्रश्न, जिसका संतोषजनक उत्तर कभी नहीं मिला, आज एक साहसी बौद्धिक यात्रा बन चुका है — "श्रद्धा की अग्निपरीक्षा।"
भारत की तीन सबसे पूजनीय साहित्यिक विरासतों — पुराण, रामायण और महाभारत — को यह पुस्तक चार निर्मम कसौटियों पर परखती है: विज्ञान, तर्क, इतिहास और मानव-गरिमा। भागवत पुराण में बताई गई चाँद की दूरी NASA के मापों से कितनी भिन्न है? हनुमान चालीसा की एक काव्य-पंक्ति को खगोलीय सूत्र कैसे बना दिया गया? क्या रामायण की 'आदर्श नारी' सशक्त करती है या सीमित? क्या महाभारत के 'धर्मयुद्ध' में सचमुच न्याय जीतता है — या सिर्फ शक्ति?
26 अध्यायों और तीन खंडों में फैली यह पुस्तक मिथक और विज्ञान, काव्य और इतिहास, श्रद्धा और विवेक के बीच की धुंधली रेखा को स्पष्ट करती है — गीता प्रेस से लेकर NASA, Wendy Doniger से लेकर डॉ. आंबेडकर तक, प्रामाणिक स्रोतों और विद्वानों के हवाले से।
यह पुस्तक किसी की आस्था तोड़ने के लिए नहीं — बल्कि परंपरा को अधिक गहराई और ईमानदारी से समझने के लिए लिखी गई है। नचिकेता, कबीर, गार्गी और आंबेडकर की उसी प्रश्न-परंपरा में खड़े होकर, यह हर उस पाठक को आमंत्रित करती है जो श्रद्धा को अंधता नहीं, विवेक के साथ जीना चाहता है।
"श्रद्धा से ऊपर सत्य; भय से ऊपर विवेक।"
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