You can access the distribution details by navigating to My Print Books(POD) > Distribution
हम कहाँ से आए? यह संसार कैसे बना? बेबीलोन के लोगों ने क्यों माना कि मनुष्य मिट्टी से बना है और उस मिट्टी में एक मारे गए देवता का रक्त मिला था? वैदिक कवियों ने संसार को एक विराट पुरुष की बलि से उपजा क्यों कहा, और फिर उसी साँस में यह भी क्यों पूछ लिया कि क्या देवता भी जानते हैं कि यह सब कैसे शुरू हुआ?
सृष्टि का आविष्कार इसी प्रश्न की यात्रा है। यह पुस्तक दो अलग सवाल अलग-अलग रखती है। पहला सवाल है कि लोगों ने किसी बात को मानना क्यों शुरू किया। दूसरा है कि क्या उसके सच होने का कोई प्रमाण है। पहले का उत्तर इतिहास और मनोविज्ञान में मिलता है, दूसरे का चट्टानों, जीवाश्मों, जीनों और तारों में।
पाँच भागों और अट्ठाईस अध्यायों में आप देखेंगे:
डर, जिज्ञासा और मृत्यु से सृष्टि-कथाएँ कैसे जन्मीं, और कथा पवित्र सत्य कैसे बनी
हिंदू, अब्राहमी, बौद्ध-जैन और अफ़्रीका, एशिया, अमेरिका और ओशिनिया की परंपराएँ, सब एक ही कसौटी पर
जब कथा अधिकार बनी: पुरोहित, सत्ता, धन, जाति, नस्ल और प्रश्न पूछने वालों का दमन
विज्ञान अतीत को कैसे पढ़ता है: मानव-विकास, DNA, भारत में मानव-उत्पत्ति, पृथ्वी और ब्रह्मांड की आयु
पहले मनुष्य, चमत्कार, प्रकाशना, प्राचीन ज्ञान और नैतिकता के दावे, प्रमाण के आमने-सामने
पुस्तक हर महत्त्वपूर्ण दावे पर बताती है कि प्रमाण कितना मज़बूत है: स्थापित, संभावित, विवादित या अज्ञात। यह विज्ञान की ग़लतियों और सीमाओं पर भी उतनी ही ईमानदारी से बात करती है।
यह पुस्तक धर्म-विरोधी नहीं है, और किसी की आस्था का मज़ाक नहीं उड़ाती। यह समझ, प्रश्न, प्रमाण और स्वतंत्र सोच का आमंत्रण है। जिज्ञासु पाठकों, विद्यार्थियों, शिक्षकों और उन सभी के लिए, जो मानने के पीछे का "क्यों" जानना चाहते हैं।
Currently there are no reviews available for this book.
Be the first one to write a review for the book सृष्टि का आविष्कार.