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अष्टावक्र गीता – महागीता
आत्म-साक्षात्कार का गीत। स्वयं के सत्य की वाणी।
अष्टावक्र गीता, जिसे महागीता भी कहा जाता है, बालयोगी अष्टावक्र और राजा जनक के बीच हुए एक गहन संवाद का संकलन है — अद्वैत वेदांत परंपरा के सबसे प्रत्यक्ष और निर्भीक ग्रंथों में से एक। यह कोई ऐसा मार्ग नहीं जो कर्मकांड, भक्ति या क्रमिक साधना पर आधारित हो; अष्टावक्र सीधे हृदय की गहराई में उतरकर कहते हैं — तुम न देह हो, न मन; तुम तो वह असीम, सदा-मुक्त चैतन्य हो।
इस हिंदी संस्करण में अनुराग द्वारा मूल संस्कृत श्लोकों का अनुवाद और भावार्थ प्रस्तुत किया गया है, विशेष रूप से उस आधुनिक साधक के लिए जो उधार ली गई मान्यताओं से मुक्त होकर सीधे देखने को तैयार है। प्रत्येक अध्याय में अष्टावक्र की शिक्षा को सरल, समकालीन भाषा में खोला गया है — इस प्राचीन संवाद को आज के साधक के उन्हीं प्रश्नों से जोड़ते हुए: अपनी भूमिकाओं के परे मैं कौन हूँ? जब विचार शांत हो जाते हैं, तब क्या शेष रहता है? यहीं, अभी, मुक्त होने का क्या अर्थ है?
चाहे आप अद्वैत की इस यात्रा में नए हों, या ओशो, रमण महर्षि अथवा निसर्गदत्त जैसे आचार्यों के माध्यम से वर्षों से इस पथ पर चल रहे हों — यह पुस्तक आपके अपने स्वभाव को प्रतिबिंबित करने वाला एक स्पष्ट दर्पण है — समझने योग्य कोई सिद्धांत नहीं, बल्कि पहचानने योग्य एक सत्य।
यह पुस्तक भीतर मुड़ने का, गहराई से प्रश्न करने का, और अपने सच्चे स्वरूप के प्रति जागने का एक निमंत्रण है।
— अनुराग
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