You can access the distribution details by navigating to My Print Books(POD) > Distribution
नानी के अंतिम संस्कार के तीसरे दिन, बेंगलुरु की AI engineer मेधा को उनकी पुरानी कठोपनिषद् में एक बिजली का बिल मिलता है। उस पर नानी की लिखावट में एक पंक्ति है—वेदिका से पूछना है।
उसी सप्ताह उसकी कंपनी का AI system, "मंथन", एक स्त्री को नौकरी की दौड़ से बाहर कर देता है—क्योंकि उसने अठारह महीने अपनी माँ की सेवा की थी।
एक प्रश्न से शुरू होकर मेधा की यात्रा काशी के घाटों, हिमालय के एक गाँव, और शृंगेरी, मेलकोटे और उडुपी तक जाती है—नचिकेता, गार्गी, मैत्रेयी और उपनिषदों के ऋषियों के साथ; कर्म, पुनर्जन्म, माया और मोक्ष के प्रश्नों के बीच; और एक ऐसे पारिवारिक रहस्य की ओर, जिसे तीस साल तक एक पुरानी अलमारी में छिपाकर रखा गया था।
यह उपन्यास भारतीय दर्शन की अनेक परम्पराओं को उनकी पूरी गरिमा के साथ सामने रखता है—और किसी एक को अंतिम उत्तर नहीं कहता। क्योंकि कभी-कभी जीवन ऐसा प्रश्न पूछता है, जिसके सामने एक उत्तर कम पड़ जाता है।
मेधा से प्रज्ञा तक की एक यात्रा—बुद्धि से देखने तक।
Currently there are no reviews available for this book.
Be the first one to write a review for the book एक उत्तर कम पड़ गया.