You can access the distribution details by navigating to My Print Books(POD) > Distribution
नज़ीराबाद एक छोटा-सा क़स्बा है, जहाँ लोग एक-दूसरे को नाम से जानते हैं, एक-दूसरे के दुख में शरीक होते हैं और अपनी-अपनी आस्थाओं के साथ बरसों से साथ रहते आए हैं। इसी क़स्बे में रहता है अमान फ़ारूक़ी—एक ऐसा लड़का जिसके लिए सवाल करना महज़ आदत नहीं, सच तक पहुँचने का रास्ता है।
एक दिन एक सवाल, एक अधूरा वाक्य और एक काट-छाँटकर बनाई गई आवाज़ उसकी ज़िंदगी बदल देती है। जो बात एक जिज्ञासा थी, वह धीरे-धीरे इल्ज़ाम बन जाती है; इल्ज़ाम से मुनादी तक पहुँचती है, और फिर उसकी गूँज सिर्फ़ अमान तक नहीं रहती—उसके परिवार, उसके दोस्तों और पूरे नज़ीराबाद को अपने घेरे में ले लेती है।
मगर इशनिन्दा केवल एक लड़के पर लगे इल्ज़ाम की कहानी नहीं है।
यह उस डर की कहानी है जो अच्छे लोगों को भी चुप करा देता है। उस सत्ता की कहानी है जो कभी-कभी आस्था के नाम पर बोलती है। उन रिश्तों की कहानी है जो समाज के फ़ैसलों के सामने परखे जाते हैं। और उन लोगों की भी, जो अन्याय देखते हुए न तो उसके साथ खड़े होते हैं, न उसके ख़िलाफ़—बस चुप रहते हैं।
अमान के सवाल के सामने धीरे-धीरे एक बड़ा सवाल खड़ा होता है—
क्या आस्था इतनी कमज़ोर हो सकती है कि एक सवाल से डर जाए?
और अगर किसी इंसान को ख़ामोश कर दिया जाए, तो क्या उसका सवाल भी ख़त्म हो जाता है?
इशनिन्दा किसी मज़हब के ख़िलाफ़ लिखी गई कहानी नहीं, बल्कि आस्था, विवेक, भय और इंसाफ़ के बीच उस महीन रेखा की तलाश है जहाँ सवाल करना भी इबादत जैसा हो सकता है।
क्योंकि हर आवाज़ जो माइक से आती है, सच नहीं होती—और हर ख़ामोशी बेगुनाही नहीं।
Currently there are no reviews available for this book.
Be the first one to write a review for the book Ishninda.