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सामूहिक सृजनशीलता और अनपेक्षित मोड़ों का पहला हिंदी संग्रह
वर्ष 2005 में, जब हिंदी का डिजिटल परिदृश्य अपनी बाल्यावस्था में था, न फ़ेसबुक था, न व्हाट्सएप, न रील्स, तब भारतीय इंटरनेट के कुछ मूर्धन्य रचनाकारों ने कोलैबरेटिव श्रृंखला-लेखन (रिले-राइटिंग) की एक अनोखी संकल्पना को जन्म दिया, जहाँ रचना की दिशा पूर्व-निर्धारित नहीं थी।
“बुनो कहानी” का केवल एक नियम था: प्रत्येक लेखक कहानी के सूत्र को एक ऐसे रोचक व अप्रत्याशित मोड़ पर छोड़कर आगे बढ़ेगा, जहाँ से अगला लेखक उस अज्ञात दिशा में अपनी कल्पना के पंख फैला सके। न कोई पूर्व-नियोजित कथानक, न कोई अंतिम पड़ाव।
यह संग्रह स्थापित लेखकों की परिष्कृत रचना नहीं, बल्कि सामूहिक सृजनशीलता, अनगढ़ता और अनिश्चितता का जीवंत दस्तावेज़ है। यहाँ देश के विभिन्न रचनाकारों, जो उस समय हिंदी ब्लॉगिंग से जुड़े थे, की कलम ने एक-दूसरे के विचारों के साथ सामंजस्य बिठाते हुए, अंतर्जाल के इतिहास में पहली बार एक साझी विरासत की नींव रखी।
यदि आप बंधे-बंधाए ढर्रे से इतर, अनपेक्षित मोड़ों और सृजनात्मकता के एक अनूठे ताने-बाने को महसूस करना चाहते हैं, तो इस ऐतिहासिक यात्रा में आपका स्वागत है।
Bonus: एक खास बोनस के तौर पर, पुस्तक के इस पेपरबैक संस्करण में एक खास, अधूरी post-apocalyptic कहानी भी शामिल है (जो ऑनलाइन या eBook में उपलब्ध नहीं है)। हम आपको आमंत्रित करते हैं, सह-लेखक के रूप में, इस कहानी को पूरा करने या इसका अगला भाग लिख कर किन्ही अन्य लेखक को रिले करने के लिये। अधिक जानकारी पुस्तक में उपलब्ध है।
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