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इस पुस्तक को तैयार करने के पीछे हमारा उद्देश्य यही रहा कि युवा पीढ़ी तक हमारा सनातन धर्म आसान और सरल भाषा में पहुंच सके तथा उनके प्रश्नों का हल दे सके; इस दिशा में लेखकों को पूर्णतः स्वतंत्रता दी गई है। जैसे कि सुमन बिष्ट जी ने अपने लेख के द्वारा शूर्पणखा की मन: स्थिति का आंकलन किया है।
कहीं अनुभव से धवल कलम ने बहू की गौरवशाली भूमिका का वर्णन किया है; जैसे पंडित रमेश चंद्र जी त्रिवेदी ने तो कहीं युवा कलम ने भरत जैसे अमर व्यक्तित्व का उल्लेख अपनी कलम द्वारा सार्थक ढंग से किया है जैसे सुश्री नंदिनी शर्मा ने।
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