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विचार क्रांति
मनुष्य का मन बहुत चंचल स्वभाव का होता है पर जब वह दुखद या असहनीय परिस्थिति में होता है या गुजरता है तो उसके मन के भाव स्थिर हो जाते हैं कुछ समय के लिए वही स्थिर भाव विरक्ता की ओर जोड़ता है मन में अंतर्द्वंद चलते हैं भावो विचारों का आदान-प्रदान होने लगता है कभी भाव सुखद एहसास की ओर खींचते है कभी दुखद कभी सब कुछ त्याग कर बस मोक्ष पाने की ओर खींचते है विचारों में अंदर ही अंदर क्रांति के भाव छिड़ जाते हैं वहा एक सही मार्ग दर्शक की जरूरत होती है जो इन बस चीजों से बाहर निकाल कर सही राह दिखा सके जीवन का सही अर्थ बता सके मनुष्य जीवन बार बार नहीं मिलता तो इसे सही मार्ग पर चलाने के लिए सही राह चुननी पडती है और एक लक्ष्य को चुन आगे बढना पडता है सुख दुख जीवन के दो किनारे है ये तो मिलत ही रहेगे कर्म सही हो तो जीना भी आसान हो जाता है कोई कवि कोई कलाकार कोई दार्शनिक बन जाता है कोई साधारण मनुष्य ही रह जाता है।
"कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा करमफलहेतु भूर्माते सडगोंऽस्त्वकर्मणिय।।
वेदव्यास जी ने महाभारत के इस स्लोक में श्री कृष्ण द्वारा ये ही उपदेश दिया गया है कि मनुष्य को कर्म करते रहना चाहिए फल की इच्छा नहीं रखनी चाहिए।।
डाॅ चन्द्रकला भागीरथी
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