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भूमिहारनामाः भूमिहार प्रसंग' भारतीय सामाजिक इतिहास, नृविज्ञान और पुरा-दस्तावेज़ों पर आधारित एक शोधपरक व प्रामाणिक ग्रंथ है। तीन दशकों के गहन शैक्षणिक अनुभव से उपजा यह कार्य औपनिवेशिक खांचों, सतही राजनीतिक सरलीकरणों और समकालीन प्रशासनिक विसंगतियों का प्राथमिक साक्ष्यों के आधार पर दस्तावेजी प्रत्युत्तर प्रस्तुत करता है। यह पुस्तक केवल दावों पर नहीं, बल्कि शिलालेखों, राजस्व अभिलेखों, ब्रिटिश गजेटियरों, ऐतिहासिक जनगणना प्रतिवेदनों और विधिक नज़ीरों पर खड़ी है: ऐतिहासिक निरंतरता एवं पुरा-दस्तावेज़: १२४४ ईस्वी के बेतिया राज के जेथरिया साक्ष्य, महाकवि बाणभट्ट की सोनभदरिया वत्स परंपरा, अठारहवीं सदी का फारसी ग्रंथ 'बलवंतनामा', और १५२६ ईस्वी के मदारपुर संग्राम से जुड़े ३६० कान्यकुब्ज वंशावली संदर्भ। औपनिवेशिक अभिलेख एवं जनगणना साक्ष्य: फ्रांसिस बुकानन सर्वेक्षण (१८१०), १८६५ की पश्चिमोत्तर प्रांत जनगणना (पृ. ११८ पर 'Ujach/Ayachak Brahmins' प्रलेखन), १८९१ का पलामू बंदोबस्त प्रतिवेदन (रोटी-पानी संबंध), तथा १९११ के आधिकारिक प्रशासनिक संज्ञान। आंतरिक संरचना व नृविज्ञान: बाभन (भूमिहार ब्राह्मण) समाज के १६७ मूलों, शाखाओं, डीहों और वैवाहिक संजालों का गहन समाजशास्त्रीय विश्लेषण। विधिक एवं न्यायिक स्वीकार्यता: भारत के उच्चतम न्यायालय के ऐतिहासिक निर्णय—हरिहर प्रसाद सिंह बनाम बाल्मीकि प्रसाद सिंह (१९७४), बेतिया राज उत्तराधिकार वाद (१९८० व १९८३), तथा मराठा आरक्षण संविधान पीठ (२०२१) में आधिकारिक वर्गीकरण ("Brahmins including Bhumihars")। आध्यात्मिक स्वावलंबन: काशीराज के द्विजराज स्वरूप, रामानुज संप्रदाय के मठों का योगदान, और स्वामी सहजानंद सरस्वती कृत 'कर्मकलाप' व 'गीता हृदय' के माध्यम से पुरोहिती परावलंबन से मुक्ति का ऐतिहासिक विमर्श। यह ग्रंथ समाजशास्त्रियों, इतिहासकारों, प्रशासनिक शोधार्थियों और विचारशील पाठकों के लिए भारतीय सामाजिक संरचना की वास्तविक परतों को समझने हेतु एक अनिवार्य प्राथमिक संदर्भ ग्रंथ है।
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