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“ज़िंदगी जीने में, और महज़ ज़िंदगी काटने में ज़मीन-आसमान का फ़र्क़ होता है...”
'विडम्बना और अन्य कविताएँ' समकालीन समाज के उस दोहरे चेहरे को उजागर करता है, जहाँ एक ओर डिग्रियों से पटे घर और गगनचुंबी पेंटहाउस हैं, तो दूसरी ओर खोखले आदर्श, बिकाऊ व्यवस्था और एकाकीपन का गहरा शून्य।दिलीप कुमार की लेखनी किसी लाग-लपेट या साहित्यिक पाखंड में विश्वास नहीं करती। वे सीधे ज़मीनी यथार्थ के खुरदरे पत्थरों पर कलम चलाते हैं—चाहे वह सेनारी के नरसंहार का असहनीय दर्द हो, दिनकर के ओज को चुराती स्वार्थी राजनीति हो, या मानदेय पर बंधुआ मज़दूर की तरह पिसता शिक्षक। यह काव्य-संग्रह केवल पढ़ा जाने वाला ग्रंथ नहीं, बल्कि आधुनिक व्यवस्था और आत्म-चेतना के बीच चलने वाला एक तीखा वैचारिक संवाद है।
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