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एक अदृश्य कैद : मनुष्य बनाम समाज
क्या हम वास्तव में स्वतंत्र हैं?
क्या हमारे निर्णय वास्तव में हमारे अपने होते हैं, या वे उन अदृश्य सामाजिक दबावों, अपेक्षाओं, परंपराओं और भय का परिणाम होते हैं जिन्हें हम बचपन से अपने साथ लेकर चलते हैं?
एक अदृश्य कैद : मनुष्य बनाम समाज एक विचारोत्तेजक यात्रा है, जो व्यक्ति और समाज के बीच चल रहे मौन संघर्ष को समझने का प्रयास करती है। यह पुस्तक “लोग क्या कहेंगे”, सामाजिक स्वीकृति, परिवार की अपेक्षाएँ, प्रतिष्ठा, परंपराएँ, पहचान, स्वतंत्रता और आत्मबोध जैसे विषयों की गहराई से पड़ताल करती है।
यह पुस्तक समाज के विरोध की नहीं, बल्कि समाज को समझने और स्वयं को पहचानने की यात्रा है। लेखक पाठक को तैयार उत्तर नहीं देता, बल्कि ऐसे प्रश्नों के सामने खड़ा करता है जो उसे अपने जीवन, निर्णयों और अस्तित्व पर पुनर्विचार करने के लिए प्रेरित करते हैं।
यदि आपने कभी अपने सपनों और समाज की अपेक्षाओं के बीच संघर्ष महसूस किया है, यदि आपने कभी स्वयं से पूछा है कि “मैं वास्तव में कौन हूँ?”, तो यह पुस्तक आपके लिए है।
क्योंकि कभी-कभी सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न समाज से नहीं, स्वयं से पूछे जाते हैं।
लेखक: डॉ. जमशेद
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