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जिन्हें आप ‘कुकुरमुत्ता’ कह रहे हैं, उन्हें कुकुरमुत्ता कहने का हक आपको किसने दिया?
बल्लाल सेन की कुलपंजी से मैकाले के ‘अंग्रेज़ी रुचि’ वाले वर्ग तक, आकाशवाणी पर फ़िल्मी गीतों की पाबंदी से दूरदर्शन के इकलौते चैनल और बॉलीवुड के खानदानी दरवाज़ों तक: सदियों से कोई न कोई तय करता आया है कि कौन बोलेगा और कौन सिर्फ़ सुनेगा। सस्ते स्मार्टफ़ोन और लगभग मुफ़्त डेटा ने वह दरवाज़ा तोड़ दिया। राणाघाट स्टेशन की गायिका से पटना के मास्टर तक, घूंघट वाली राजस्थानी रसोइया से बुंदेलखंड की ग्रामीण महिला पत्रकारों तक, हाशिये के लोग आज खुद अपना प्रसारण केंद्र हैं। और अब एआई कुलीनता के आखिरी किले पर चोट कर रहा है: हुनर और सनद के एकाधिकार पर।
पर यह जश्न की किताब नहीं। एल्गोरिदम के बेचेहरा द्वारपाल, वायरल शोहरत की बेरहम असमानता, अफ़वाहों से हुई हत्याएं, इंटरनेट बंदी और अंग्रेज़ी बोलती एआई की नई कुलीनता: जवाबी तर्कों को भी यहां पूरी गंभीरता से रखा गया है।
यह लेखक की बांग्ला पुस्तक ‘কৌলিন্যের পতন’ का अनुवाद नहीं, पूरे भारत के पाठकों के लिए नए सिरे से लिखा गया हिंदी संस्करण है। नौ अध्याय, 257 टिप्पणियां और चुनी हुई ग्रंथसूची पाठक को दावों और उनके स्रोतों को खुद परखने का अवसर देती हैं।
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