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वैसे ही एक भावप्रधान हिंदी काव्य-संग्रह है—उन खयालों, सवालों और एहसासों का, जिन्हें हम अक्सर महसूस तो करते हैं, लेकिन कह नहीं पाते।
इन कविताओं में रिश्तों की प्रतीक्षा है, बिछड़ने का खालीपन है, अपने ही भीतर चलती आवाज़ों की लड़ाई है और खुद को समझने की कोशिश है। कहीं एक टूटी हुई पेड़ की डाल सहारे की कहानी बन जाती है, कहीं एक डरावना सपना हकीकत के बोझ का रूप ले लेता है, और कहीं इंसान अपने ही अस्तित्व से पूछ बैठता है—“क्या यह मैं हूँ?”
यह किताब केवल उदासी की कविताएँ नहीं है। इनके बीच ख्वाब हैं, उम्मीद है और टूटने के बाद भी खुद को फिर से जोड़ने की कोशिश है।
“वैसे ही” उन बातों का संग्रह है, जो शायद कभी कही नहीं गईं—बस मन में रहीं और फिर कविता बन गईं।
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